11/05/2024
Glad to inform you that the "Quarterly Sahitya Saransh International Year:-2 Issue No.:-2" has been published. Shortly you will receive the PDF copy on your WhatsApp.
संपादकीय
*सृजनात्मक ही नहीं सजग रहने का समय*
निरंतर करवट लेते समय के साथ क़दमताल करता मनुष्य संतुलन बनाए रखने के प्रयास में कभी दौड़ता है,कभी हांफता है और कभी सुस्ता कर सोच-विचार में डूब जाता है। इस सोच विचार का सर्वाधिक प्रभाव लेखक- साहित्यकारों पर पड़ता है और उनकी क़लम से समय के धड़कते हुए लम्हें शब्द बनकर काग़ज़ पर उतरने लगते हैं कभी गीत, ग़ज़ल, कविता के रूप में, कभी कहानी, उपन्यास, व्यंग्य के रूप में। साहित्य की नाना प्रकार की विधाओं ने इसीलिए जन्म लिया होगा कि मनुष्य नामक प्राणी अपने भावों की अभिव्यक्ति को मूर्त रूप दे सके और ऐसा वैचारिक माहौल तैयार करे जिससे इस सृष्टि में एक समतामूलक, सुगठित, सुव्यवस्थित सामाजिक सरोकार की संरचना का गठन हो सके। सामाजिक स्तर के इस गठन को अमली जामा सत्ता के हाथों द्वारा पहनाया जाता है जिनके पास ताकत है, संसाधन हैं ,संचालित करने की क्षमता है, संप्रभुता है।
हम क्यों, किस लिए और किसके लिए लिख रहे हैं क्या कभी इस प्रश्न ने आपको विचलित किया है? स्वांत: सुखाय लेखन यदि है तो उसे प्रकाशित होने की क्या आवश्यकता लेकिन प्रकाशित होने की लालसा या प्रकाश में आने की आकांक्षा का मतलब तो यही हुआ कि आप इस दुनिया को और बेहतर देखने की कामना मन में रखते हैं। समय के अंधकारमय पक्ष में प्रकाश का वातावरण निर्मित करना चाहते हैं जहां हर एक व्यक्ति को अपने पैरों के लिए ज़मीन और सर के लिए छत मुहैया हो सके।चाहते हैं कि जो भी विसंगतियां, विडंबनाएं, विषमताएं आसपास दृष्टिगोचर हो रही हैं उनमें बदलाव हो इसके लिए एक पैनी दृष्टि व तटस्थ विचारों के साथ अपने नेतृत्व का चुनाव भी बहुत महत्वपूर्ण चुनौती है। अतः दृष्टि का सजग व सतर्क रहना वर्तमान परिदृश्य में अति आवश्यक गुण धर्म मालूम पड़ता है।ताकि क़लम की चमक फीकी ना पड़े।
हमारा उद्देश्य जिस सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ना चाहता है उस दिशा में साहित्य का समुचित प्रकाश फैल कर पाठकों के हृदय को आलोकित कर दे तो समझें कि लिखना सार्थक हुआ। रचनाओं का आलोक कितना प्रभावी होता है कि इसे समाज का दर्पण यूं ही नहीं कहा जाता। एक समय था जब सरकारें भी क़लम की ताकत से थर्रातीं थीं। इस क़लम की धार को भोथरी नहीं होने देना है तभी लेखन की सार्थकता है अन्यथा नाम मात्र के लिए लेखक बन जाना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन लेखकीय धर्म का निर्वाह नागरिक होने के दायित्व के साथ करना कर्त्तव्य बोध की निशानी है।
डाॅ० ख़ुदेजा ख़ान