01/12/2018
1400 साल पुराना इतिहास , #राणाकुम्भा का है इस जगह से खास रि शता
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उपखंड मुख्यालय से 12 किलोमोटर की दुरी पर स्तिथ गाँव बसंतगढ़ जो कभी धार्मिक व् सांकृतिक केंद्र रह चूका है ! बसंतगढ़ का इतिहास 1400 साल से भी पुराना है! 1400 साल पहले यहाँ एक समृद्धशाली नगरी हुआ करती थी और राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख भी इसी का जगह से प्राप्त हुआ था! इस जगह की भोगोलिक व् प्राकृतिक स्तिथि से अभिभूत होकर कई राजाओ ने बसंतगढ़ को अपने अधीन रखा व् यहाँ कई मंदिरों ,जलाशयों का निर्माण भी करवाया और अंतिम में मेवाड़ के शासक राणा कुम्भा ने भी इस जगह के महत्व को समझ कर यहाँ की पहाडियों पर विशाल क्षेत्र में बसंतगढ़ की रक्षा के लिए बसंतिदुर्ग के नाम से एक किले का निर्माण करवाया था जो सरक्षण के आभाव में आज खंडर में तब्दील हो चूका है! राणा कुम्भा के बाद से बसंतगढ़ ताम्बे व् पीतल की मूर्ति बनाने का केंद्र रहा है! जिस कारण आज भी बसंतगढ़ व् आसपास क्षेत्र के लोग मूर्ति कला में माहिर है! वर्तमान में इस जगह पर कई मंदिर मोजूद है जिसमे अतिप्राचीन बरह्मा,विष्णु, महेश,क्षेमकरनी माता ,सूर्य मंदिर सहित जैन मंदिर प्रमुख है ! इन मंदिरों मेसे कुछ मंदिर यथावत स्तिथि में है तो कुछ खंडर में तब्दील हो चुके है ! लेकिन आज भी बसंतगढ़ की भटेश्वरफली में मोजूद तमाम ऐतिहासिक धरोहर हमें 1400 वर्ष पूर्व का एहसास करवाती है !
◆क्या है बसंतगढ़ का इतिहास
राजस्थान के सिरोही जिले के पिण्डवाडा उपखंड मुख्यालय के निकट ग्राम बसंतगढ़ की भटेश्वर फली जो अपने आप में ऐतिहासिक दृष्टी से विशेष स्थान रखती है !किसी समय एक समृद्धशालीनगरी हुआ करती थी ऐसा माना जाता है की बसंतगढ़ की स्थापना ऋषि वसिष्ठ ने की थी और इन्होने यहाँ अर्क और भर्ग के दो मंदिर भी बनाये थे! ऋषि वसिष्ठ सप्त ऋषियों मेसे एक माने जाते थे! इसीलिए बसंतगढ़ को वशिष्ठपुर भी कहा जाता था !जिस समय माउंट आबू ( अर्बुन्दाचल) ऋषि मुनियों की पसिंदा स्थली थी उसी के समकालीन बसंतगढ़ भी ऋषि मुनियों की पसिंदा स्थली थी और ऋषि वसिष्ठ ने अपना एक आश्रम यहाँ भी बनाया था ! बसंतगढ़ में वृट वृक्ष बहुताय में होने के कारण बसंतगढ़ को वटपुर, वटनगर के नाम से भी जाना जाता था! राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख विक्रम संवत 628 (625) इ.स का बसंतगढ़ से ही प्राप्त हुआ था! जिस पर उस समय के राजा वरमलात के उल्लेख के साथ साथ राजस्थानिय शब्द का भी उल्लेख मिलताहै! राजा वरमलात जिसे व्यध्रामुख के नाम से भी जाना जाता था जिसका शासन भीनमाल तक था और भीनमाल ही उसकी राजधानी हुआ करती थी! राजा वर्मालत के समय जारी किये गए सिक्को को वरमलता कहा जाता था ! बसंतगढ़ में सतआसार और राज्जिला नामक दो सामंत थे जो राजा वरमलात के अधीन थे और उस समय यहाँ बसंतगढ़ के नाम से बसंतगढ़ नगर समिति भी चलती थी जिसका उल्लेख बसंतगढ़ में मिले विक्रम संवत 628 के शिलालेख पर मिलता है! राजा वरमालत के सामंत राजिल्ला के आदेश पर बसंतगढ़ के एक व्यापरी जिसका नाम सत्यदेव ने बसंतगढ़ में क्षेमकरनी मंदिर का निर्माण करवाया था! जिसे पहले शोमै का मंदिर कहा जाता था बाद में इसे खिमज माता और क्षेमकरनी माता मंदिर के नाम सें जाने लगा और आज भी यह मंदिर बसंतगढ़ की भटेश्वर फली की पहाडियों पर मोजूद है! राजा वरमालत का शासन 680 इ .तक रहा है! वरमलात के बाद वरमलात का सामंत राजिल्ला का पुत्र नागभट्ट 721 इ में बसंतगढ़ की गद्दी पर बैठा! विक्रम संवत 744 (687) ई. समय की जैन धर्म की मुर्तिया भी बसंतगढ़ से प्राप्त हुई थी और आज भी खंडर रूप ले चुका जैन मंदिर बसंतगढ़ में देखा जा सकता है। समय के साथ साथ यहाँ कई राजाओं ने राज कर इसे अपने अधीन रखा !जिसमे दूसरा नाम 1031 ई. का राजा धुंधक का आता है ! राजा धुंधक महिपाल के पुत्र थे और उस समय धुंधक का आबू पर अधिकार था धुंधक की विधवा पुत्री ने बसंतगढ़ में सूर्यमंदिर का निर्माण करवाया था और उसी समय माउंट आबू में देलवाडा जैन मंदिर का भी निर्माण हुआ था ! बसंतगढ़ के इतिहास में तीसरा नाम 1042 ई. का पुँरणपाल का आता है! पुँरंनपाल धनुका के पुत्र थे और परमारों के शासक थे!
पुँरंनपाल की छोटी बहन लाहिनी के पति के मृत्यु के पश्चात पुरानपाल बसंतगढ़ आ कर बस गए थे और इसी को अपनी राजधानी बनाया! पुरानपाल पाल ने अपनि छोटी बहन लाहिनी के नाम से यहाँ एक सुंदर पानी की बावड़ी का निर्माण भी करवाया था जो आज भी बसंतगढ़ में मोजूद है! बसंतगढ़ के इतिहास के पन्नो में सबसे शक्तिशाली व् अंतिम नाम ई.1433 - 1468 मेवाड़ के शासक राणा कुम्भा का आता है!जिसने कुम्भलगढ़ व् चित्तोडगढ़ जेसे भव्य दुर्गो का निर्माण करवाया था ! राणा कुम्भा को मेवाड़ के इतिहास में सबसे शक्तिशाली राजाओ मेसे एक गिना जाता है! राणा कुम्भा ने गुजरात सतत संकट व् अपने राज्य विस्तार की योजना को देखते बसंतगढ़ की पहाडियों पर एक विशाल क्षेत्र में दुर्ग का निर्माण करवाया था जिसे बसंती दुर्ग के नाम से जाना जाताहै करीब छ: किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस किले का निर्माण का मुख्यउदेश्य तंग रश्ते से मेवाड़ की सुरक्षा करना था इस किले में कई वर्षो तक कुम्भा ने सैनिको के साथ राज भी किया था! आज भी इस किले के मुख्य द्वारा पर लगी हुई गणेश प्रतिमा बसंतगढ़ में देखी जा सकती है ! किले के ध्वस्त हो जाने के बाद गणेश प्रतिमा को पास ही के शिव मंदिर में स्थापित कर दिया गया था! राणा कुम्भा ने उझड चुके बसंतगढ़ को पुनः बसाया था व् आस पास के गाव के लोगो को यहाँ रहने के लिए आमंत्रित किया था ! उस समय के बने कुए, तालाब, बावडिया और मंदिर आज भी देखे जा सकते है लेकिन समय के साथ साथ व् सरक्षण के आभाव में आज यह किला खंडर में तब्दील हो चूका है! बसंतगढ़ की सुरक्षा को लेकर बने गई किले की दिवार व् खंडित किये गए किले के भवन आज भी देखे जा सकते है! जिन्हें मात्र सरक्षण की आवश्यकता है ! यह सोचने व् चिंता का विषय भी है की जिस महाराणा कुम्भा ने कुम्भलगढ़ व् चित्तोडर्गढ़ जेसे अद्भुद व् विशाल दुर्गो का निर्माण करवाया हो उस राजा ने बसंतगढ़ के बसंतिदुर्ग को भी विशेष बनाने में कोई कसर नही छोड़ी होगी! कुम्भा के बाद बसंतगढ़ को गुहिल राजा के वर्चस्व में शामिल किया गया और गुहिल राजा के बाद सिरोही के राव सुरतान ने बसंतगढ़ को अपने अधीन ले लिया था ! लेकिन बसंतगढ़ दुर्ग की वर्तमान स्तिथि को देख कर यही लगता है की राज्यसरकार व स्थानीय प्रशासन ने इस दुर्ग सहित इस क्षेत्र के सरक्षण में कोई रूचि नही दिखाई ! जिस कारन किले सहित वहा मोजूद एतिहासिक धरोहर को स्वर्ण व् अन्य धातुओ की प्राप्ति की अभिलाषा में तोड़ दिए गए और आज भी इस किले की दिवार के पत्थर चोरी हो रहे है !बसंतगढ़ पर अभी और खोज व् अधयन्न की आवश्यकता है!
◆बसंतगढ़ क्यों है ऐतिहासिक दृष्टी से विशेष:-
अर्बुन्दांचल (माउंट आबू ) के समकालीन बसंतगढ़ भी ऋषि मुनियों की पसिंदा स्थली रही है और बसंतगढ़ को ऋषि वसिष्ठ ने ही बसाया था!
बसंतगढ़ में राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख विक्रम संवत 628(625 ) ई का मिला था!
विक्रमसंवत 628 (625) इ के समय बसंतगढ़ में बसंतगढ़ नगर समिति चलती थी जो राजा वरमलात के अधीन थी! इसका उल्लेख बसंतगढ़ में मिले शिलालेख पर मिलता है !
बसंतगढ़ में आज भी कई बावडिया ,मंदिर, कुए,किले की दिवार सहित कई एतिहासिक धरोहर मोजूद है!
बसंतगढ़ में मोजूद किले दिवार कुल छ: किलोमीटर क्षेत्र में फेली हुई है और किले की दिवार पर चढने के लिए हर जगह सीढिया बनी हुई है!
ताजे सर्वे के मुताबिक कुछ जगह किले के दिवार की उचाई बीस फिट से भी ज्यादा है जिस पर चढ़ने के लिए 13 सीडिया बनी हुई है!
इसी किले के पास से एक के नदी गुजरती है जिसकी प्राकृतिक सरचना चीन की य्नाग्ताजी नदी से मिलती है !और आज भी इस नदी की सरचना से अभिभूत होकर लोग इस नदी को देखने आते है !
कुम्भा के समय का पश्चात बसंतगढ़ तांबा व् पीतल की मूर्ति बनाने का केंद्र था! और जिस समय की बनाई हुई नंदी की ताम्बे के मूर्ति आज भी माउंट आबू के अचलेश्वर मंदिर में लगी हुई है ! जिस कारन आज भी बसंतगढ़ के लोग मूर्ति कला में माहिर है!
विक्रम संवत 1956 (1899) इ में बसंतगढ़ दुर्ग परिसर में से पंच धातुओ का खजाना भी प्राप्त हुआ था!
बसंतगढ़ में बहने वाले एक नदी की प्राकृतिक सरचना हुबहू चीन की यांगत्जी नदी से मिलती है! कुम्भा के समय किले में जल की आपूर्ति इसी नदी से होती थी और आज भी इस नदी की प्राकृतिक सरचना से अभिभूत हो कर लोग इस नदी को देखने आते है और यहाँ फोटोग्राफी भी करते है !
बसंतगढ़ में शिवनाग नामक प्रख्यात शिल्पकार हुआ था जो निर्माण कला में प्रजापति ब्रह्मा का प्रतिस्पर्धी कहा जाता था ! शिवनाग ने बसंतगढ़ में कई मंदिरों व् जैन धमालाम्बियो की मूर्ति का भी निर्माण किया था !
कुम्भा के समय के पूर्व का जैन मंदिर आज भी यहाँ खंडर के रूप में देखा जा सकता है! जिसे कुछ वर्षो पूर्व आधे हिस्सा में देखा जाता था !
इतिहाससकाय में पीएचडी करने वाले विद्यार्थियों के लिए बसंतगढ़ अधयन्न करने योग्य जगह है !और कई विद्यार्थी आज भी यहाँ अधयन्न करने आते है !
बसंतगढ़ का किला राजस्थान के एक मात्र ऐसा किला है जो गुप्तकाल में बना हुआ है !
बसंतगढ़ किले के सरक्षण व् पर्यटन स्थल घोषित करने से सिरोही जिले व् मेवाड़ के इतिहास में एक और अध्याय जुड़ जायेगा !
बसंतगढ़ माउंट आबू के साथ साथ उदयपुर के इतिहास का हिस्सा है और इसके सरक्षण से माउंट आबू और उदयपुर की कड़ी में बसंतगढ़ भी जुड़ सकता है !
हम करीब दो साल से भी ज्यादा समय से बसंतगढ़ के इतिहास पर अध्यनन कर रहे है। जिसमे पाया की बसंतगढ़ का इतिहास 1400 साल से भी पुराना है! 1400 साल पहले यहाँ समृदशाली नगरी हुआ करती थी! और वरमालत के शासन काल में बसंतगढ़ नगर समिति चलती थी !बसंतगढ़ की प्राकृतिक व् भोगोलिक विशेषता से प्रभावित होकर कई राजाओ ने बसंतगढ़ को अपने अधीन रखा था और उनके समय की बनाई हुई कई एतिहासिक धरोहर आज भी बसंतगढ़ में मोजूद है! राणाकुम्भा ने अपने चार प्रमुख दुर्गो मेसे एक दुर्ग का निर्माण यही करवाया था ! लेकिन यह समझ नही आता की इतनी प्राचीन एतिहासिक धरोहर को आज दिन तक सरक्षण क्यों नही मिल पाया ! बसंतगढ़ का शायद यह दुर्भाग्य ही रहा हो के इतना पुराना इतिहास होने के बावजूद विशेषज्ञों ने इसे भुला दिया ! चंद्रवती की तरह बसंतगढ़ में खुदाई व् और अधयन्न की आवश्यकता है ! बसंतगढ़ को सरक्षण मिलना जरुरी है !
#गोविन्द_सिंह_विरॉली