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मेरे द्वारा रचित मौलिक रचना ऑपरेशन संदूर एक शौर्य गाथा शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है। इसमें सभी का सहयोग हुआ आशीर्वाद जर...
18/04/2026

मेरे द्वारा रचित मौलिक रचना ऑपरेशन संदूर एक शौर्य गाथा शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है। इसमें सभी का सहयोग हुआ आशीर्वाद जरूरी है यह खंडकाव्य सफलतापूर्वक देशभक्ति से और स्रोत देश में पूरी तरह से प्रचलित व प्रसारित हो।
डॉक्टर भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित भुवन
#ऑपरेशन सिंदूर एक शौर्य गाथा
​(आतंक का वीभत्स पदार्पण)
​१.
वह काली रजनी आई थी, लेकर के विषधर का टोला,
सागर की लहरों पर चढ़कर, आया था वह काल गोला।
दस गीदड़ भेड़ियों की सूरत, कायरता का वेश धरे,
भारत की पावन मिट्टी पर, जो जघन्य अपराध करे।
​२.
कराची के उन गंदे नालों की, जो मलिन पैदाइश थी,
मजहब के झूठे नारों की, वह घृणित नुमाइश थी।
हथियारों का बोझ लादकर, वह शैतानी दल आया,
मुंबई की सुख-शांति पर, अपना खूनी साया लाया।
​३.
कोलाबा की गलियों में जब, पहली गोली गूँजी थी,
मासूमों के लोहू से फिर, धरती माँ ने पूँजी थी।
बौखलाए वे नराधम सब, गोलियाँ बरसाते थे,
आतंकी वे नरपिशाच, अट्टहास कर जाते थे।
​४.
लियोपोल्ड की मेजों पर, बिखरी लाशों की कतारें थीं,
इंसानियत को शर्मसार करती, वे खूनी तलवारें थीं।
विभत्स दृश्य था वह ऐसा, रूह काँप जो जाती थी,
आतंकियों की वह क्रूरता, मृत्यु को भी लजाती थी।
​५.
अजमल कसाब वह नीच अधम, जो मौत का सौदा लाया था,
आँखों में वह वहशीपन था, जो नरक से आया था।
मासूमों के सीने चीरे, उसने निर्भय होकर के,
पाप का घड़ा भरा था उसने, रक्त की नदियाँ धोकर के।
​६.
इस्माइल खान वह दूसरा कुत्ता, पागलपन में चूर रहा,
मानवता के हर आदर्श से, जो मीलों ही दूर रहा।
अबू इस्माइल का वह खंजर, पीठ वार ही करता था,
कायरता का वह पुतला बस, निर्दोषों से लड़ता था।
​७.
छत्रपति के स्टेशन पर, अंतड़ियों का ढेर लगा,
बर्बरता की सीमा लाँघी, यमराज का फेर लगा।
लाशों के उन लोथड़ों पर, वे दानव मुस्काते थे,
भूखे नंगे वे मजहबी, बस जहर उगलते जाते थे।
​८.
ताज होटल की उन दीवारों पर, धब्बों की कहानी थी,
अबू आका और शोएब की, वह नीच जवानी थी।
अमानवीयता की सारी हदें, पार जिन्होंने की हर पल,
भून दिया उन राहगीरों को, करके वे बेहद छली-छल।
​९.
बाबर इमरान और नजीर जैसे, मलिन कीड़े वे सारे,
जहाँ-जहाँ वे कदम बढ़ाते, लाशों के लगे वहाँ ढेरे।
नारी की चीखें गूँज रही थीं, ओबेरॉय की रातों में,
विष भरा था उन अधमों की, मजहबी झूठी बातों में।
​१०.
नरमुंडों की वह होली थी, वह खूनी तांडव भीषण था,
हर तरफ धुआँ और आग जली, वह संकट का ही क्षण था।
आतंकी वे कामी-क्रूर, बस विनाश ही करते थे,
अपने आका के इशारों पर, वे पाप की झोली भरते थे।
​(शौर्य गाथा: खाकी और राष्ट्र के प्रहरी)
​११.
पर सोई न थी वह नगरी, जब काल द्वार पर खड़ा हुआ,
खाकी का हर एक योद्धा तब, चट्टान बनके बड़ा हुआ।
पिस्तौल हाथ में छोटी थी, पर सीने में फौलाद भरा,
मुंबई पुलिस का हर राही, दुश्मन के आगे नहीं डरा।
​१२.
हेमंत करकरे वह शूरवीर, जो मृत्यु से नहीं डरा कभी,
आतंक की उस ज्वाला को, उसने ही तो घेरा था तभी।
वर्दी की गरिमा की खातिर, उसने प्राण न्यौछावर किए,
भारत माता के चरणों में, अपनी हस्ती के दीप दिए।
​१३.
अशोक कामटे वह शेर दहाड़ा, दुश्मन की छाती फटी,
विजय सालस्कर की गोली से, पाप की वह काया कटी।
अंतिम साँस तक लड़ते-लड़ते, वीरों ने रण छोड़ दिया,
पर कायर उन हमलावरों का, गर्व सदा को तोड़ दिया।
​१४.
तुकाराम ओम्बले वह नाम, जो स्वर्ण अक्षरों में अंकित,
जिसने कसाब को ज़िंदा पकड़ा, होकर पूर्णतः समर्पित।
सीने पर गोलियाँ खाईं पर, रायफल को नहीं छोड़ा था,
यमराज के उस पाले को, उसने ही मुड़कर मोड़ा था।
​१५.
एक तरफ वे दस दरिंदे, दूजी ओर हिन्द की सेना थी,
काले लिबास के वीरों को, अब अपनी शक्ति देना थी।
NSG के उन जाँबाजों ने, नरीमन हाउस घेरा था,
आतंक के उस घनघोर तिमिर में, करने को अब सवेरा था।
​१६.
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, साहस का प्रतिमान बने,
दुश्मन की हर एक चाल को, वे ही काल समान बने।
"ऊपर मत आना" कह करके, साथियों को उसने बचा लिया,
भारत के वीर सपूत ने, मौत को गले लगा लिया।
​१७.
गजेन्द्र सिंह वह नाम अमर, जो कमांडो की शान रहा,
मौत के उस व्यापार में जो, धर्म का सच्चा ज्ञान रहा।
हवाओं में तैरकर आए वे, जैसे ईश का दूत बने,
आतंकी उन चूहों के लिए, वे यम के अटूट बने।
​१८.
होटल के गलियारों में फिर, गोलियों का वह शोर हुआ,
पाप के उन प्रहरियों पर, वीरों का अब जोर हुआ।
एक-एक कर वे आतंकी, मिट्टी में अब मिल रहे थे,
भारत माँ के वीर यहाँ, जय-घोषों में खिल रहे थे।
​१९.
धुआँ छँटा जब सुबह हुई, तो लाशों का वह ढेर लगा,
आतंक के उन पापियों का, अब तो अंत ही आन लगा।
नौ आतंकी मारे गए, जो नरक गामी कहलाए,
उनकी गंदी देह पर भी, कफ़न न कोई चढ़ पाए।
​२०.
कसाब अकेला बचा रहा, जो डर से थर-थर काँप रहा,
न्याय की उस लाठी का अब, वह तो वजन ही नाप रहा।
मुंबई को जो घाव दिए, उसने हर एक बेगुनाह को,
भारत ने अब ढूँढ लिया, उसकी बर्बादी की राह को।
​(न्याय की कलम और वज्र प्रहार)
​२१.
अब शुरू हुआ वह दौर जहाँ, न्याय की कलम भी बोल उठी,
आतंक की उस साजिश की, हर एक परत अब खोल उठी।
अदालत के उस मंदिर में, साक्ष्यों की बौछार हुई,
झूठ के उन पुलिंदों की, अब तो करारी हार हुई।
​२२.
उज्ज्वल निकम की दलीलों ने, फाँसी का फंदा बुना वहाँ,
न्याय की उस गूँज को, सारे ही जग ने सुना वहाँ।
कसाब के हर एक अपराध को, सिद्ध किया प्रमाणों से,
खामोश किया उस बर्बर को, सत्य के तीखे बाणों से।
​२३.
अदालत के उस कटघरे में, वह कायर नज़रें झुकाता था,
किए हुए उन पापों पर, वह मन ही मन पछताता था।
पर कानून की ताकत ने, कोई भी रहम न दिखाया,
भारत की न्याय व्यवस्था ने, जग को आईना दिखाया।
​२४.
न्यायाधीश की वह कलम चली, तो गौरव भारत का बढ़ा,
आतंक के उस मस्तक पर, न्याय का पत्थर खूब जड़ा।
मृत्युदंड का वह आदेश, गूँजा जब उस हॉल में,
फँस गया वह आतंकी, अपने ही बिछाए जाल में।
​२५.
यरवदा की उस जेल में जब, रस्सी को उसने चूमा था,
शायद वह पापी नरक की, गलियों में तब घूमा था।
फाँसी के उस फंदे पर, जब लटका वह नराधम था,
भारत की हर आँखों में, न्याय का फैला प्रकाश था।
​२६.
कसाब की वह लाश जब, गंदी मिट्टी में दबी कहीं,
आतंक के हर आका को, मिली चेतावनी बड़ी वहीं।
जो बोएगा वह जहर यहाँ, वह जहर ही तो पाएगा,
भारत की इस पावन भू पर, अब न कोई बच पाएगा।
​२७.
खत्म हुआ वह अध्याय जहाँ, शैतानों ने सर उठाया था,
वीर जवानों ने लहू से, अपना फर्ज निभाया था।
पुलिस, फौज और जनता की, वह एकता मिसाल बनी,
दुश्मन के हर एक वार पर, वह काल की ढाल बनी।
​२८.
'ऑपरेशन सिंदूर' की, यह गाथा रक्त से लिखी गई,
मासूमों की आहों से, यह शक्ति नई सी दिखी गई।
माथे का सिंदूर लुटा पर, राष्ट्र का गौरव बचा रहा,
वीरों के उस बलिदान से, इतिहास नया यह रचा रहा।
​(नोट: प्रकाशन हेतु छंद २९ से ५८ तक इसी ओजस्वी प्रवाह में सुरक्षा तंत्र की सुदृढ़ता, तटीय निगरानी और राष्ट्र की सजगता का वर्णन करते हुए अंत निम्न प्रकार होगा:)
​५९.
यह धरा अमर है वीरों की, यहाँ बलिदान ही पूजा है,
भारत के स्वाभिमान सा, यहाँ न कोई दूजा है।
शत-शत नमन उन शहीदों को, जिन्होंने रक्त चढ़ाया है,
उनकी अमिट उस गाथा ने, राष्ट्र को महान बनाया है।
​६०.
सुन लो दुनिया के देशों तुम, भारत न अब झुकेगा,
आतंक की हर एक राह को, बलवे में अब रोकेगा।
न्याय की कलम और वीरों की, यह अमर कहानी है,
हिंदुस्तान की मिट्टी अब, दुश्मनों की भी रानी है।

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15/03/2026

हम शक्तिपुंज: एक आत्म-घोष
​हम ज्योतिपुंज है, हम शक्तिपुंज है, हम ज्योत ज्वाला है,
हम जठरानल है, हम ईर्ष्यानल है, हम ही मुख ज्वाला है।
हम ही सूर्य की पहली किरण है, हम ही तिमिर का नाश है,
हम अनंत के गर्भ से जन्मा, एक नया विश्वास है।
​हम वह तपन है जो सोने को, कुंदन सा निखारती है,
हम वह तपस्या है जिसे देख, दुनिया हमें निहारती है।
भीतर दबी जो आग है, वह क्रांति का आधार है,
हम ही प्रलय की लहर है, हम ही सृजन की धार है।
​अन्याय के उस कुरुक्षेत्र में, हम गांडीव की टंकार है,
अधर्म के उस अंधियारे में, हम न्याय की तलवार है।
विष पीकर जो नीलकंठ बन, जग को अमृत देते है,
हम वही साधक है जो बाधाओं को, हंसकर चुन लेते है।
​हमारे वेग से थर्राता है, पर्वत का भी अभिमान है,
हमारी हुंकार से जागता, सोया हुआ हिंदुस्तान है।
नहीं रुकेंगे, नहीं झुकेंगे, हम काल के भी काल है,
मस्तक पर है तेज हमारे, और रगों में भूचाल है।
​ज्वाला बन जो दहक रहे, वे हम ही तो इंसान है,
हृदय में करुणा की गंगा है, मुख पर अग्नि-गान है।
हम ज्योतिपुंज है, हम शक्तिपुंज है, हम विजय की परिभाषा है,
इस बुझते हुए संसार की, हम अंतिम अमर आशा है।

डॉ भुनेश्वर दीक्षित भुवन

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