30/03/2025
मारोठ के इतिहास में गौड़ राजवंश का भी अहम योगदान रहा है।माना जाता है, कि इस राजवंश ने गौड़ बंगाला /बंगाल से बाहर देशभर में अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए थे। इसने किनसरिया, मंगलाना और मारोठ क्षेत्रों में दहिया राजवंश को हराकर गौड़ वंश का शासन स्थापित किया था। ये वो दौर था, जब अजमेर और उसके आसपास के क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान-III (सन 1177–1192) का शासन था।
चौदहवीं शताब्दी में नयचन्द्रसुरि ने अपनी पुस्तक हम्मीर महाकाव्य में मारोठ क़स्बे का नाम ‘‘महाराष्ट्र नगर’’ लिखा है, जो हमें 18वीं शताब्दी की किताबों और लेखों में भी मिलता है। कहीं कहीं इसे महारोठ लिखा गया है। वहीँ, 17वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह जहांगीर (शासनकाल सन 1605 से लेकर सन 1627) ने मारोठ के शासक गोपालदास को आसेरा का क़िलेदार बनाया था। गोपालदास और उसके पुत्र विक्रम ने जहांगीर के विरुद्ध, बग़ावत के समय शहज़ादे ख़ुर्रम (शाहजहां) की ओर से लड़ाई लड़ी थी। इनके बाद गोपालदास का एक अन्य पुत्र विट्ठलदास मारोठ की गद्दी पर बैठा जो एक प्रतापी शासक साबित हुआ। विट्ठलदास को सन 1630 में रणथंभौर का शासक भी नियुक्त किया गया था।
शाहजहां ने तख़्त पर बैठने के बाद विट्ठलदास को सन 1660 में रणथंबोर का हाकिम बना दिया। सन 1640 में उन्हें आगरा का सूबेदार और क़िलेदार नियुक्त कर दिया था। विट्ठलदास के बेटे अर्जुन गौड़ के शासनकाल में मारोठ का काफ़ी विस्तार हुआ था।
सन 1653 में मारोठ में मिले एक जैन अभिलेख के अनुसार अर्जुन गौड़ के शासनकाल में,लालचंद ने भट्टारक चन्द्रकीर्ति से, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना के लिए विशाल समारोह आयोजित करवाया था। साहित्यकार हितेश कुमार जैन के अनुसार इस क़स्बे में लम्बे समय तक जैन साधु-संतों का प्रभाव रहा था। यहां 11वीं-12वीं शताब्दी की कई जैन मूर्तियां मिली हैं
कई मंदिरों की छतों और स्तंभों पर असली सोने की गई “सुनहरी चित्रकारी” है। गौड़ शासकों को भवन बनवाने का शौक़ था। उन्होंने कई सुंदर भवन बनवाए। 14वीं शताब्दी का लक्ष्मीनारायण मंदिर, शिव मंदिर, नौलखा बाग़, सुंदर छतरियों, चबूतरों सहित अन्य कई धरोहर आज भी मौजूद हैं जिन्हें देखने के लिए दूर-दराज़ से पर्यटक आते हैं।