Gaur Rajput's -pamsa

Gaur Rajput's -pamsa Suryvanhi dharm rakshak

30/03/2025

मारोठ के इतिहास में गौड़ राजवंश का भी अहम योगदान रहा है।माना जाता है, कि इस राजवंश ने गौड़ बंगाला /बंगाल से बाहर देशभर में अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित किए थे। इसने किनसरिया, मंगलाना और मारोठ क्षेत्रों में दहिया राजवंश को हराकर गौड़ वंश का शासन स्थापित किया था। ये वो दौर था, जब अजमेर और उसके आसपास के क्षेत्र में पृथ्वीराज चौहान-III (सन 1177–1192) का शासन था।

चौदहवीं शताब्दी में नयचन्द्रसुरि ने अपनी पुस्तक हम्मीर महाकाव्य में मारोठ क़स्बे का नाम ‘‘महाराष्ट्र नगर’’ लिखा है, जो हमें 18वीं शताब्दी की किताबों और लेखों में भी मिलता है। कहीं कहीं इसे महारोठ लिखा गया है। वहीँ, 17वीं शताब्दी में मुग़ल बादशाह जहांगीर (शासनकाल सन 1605 से लेकर सन 1627) ने मारोठ के शासक गोपालदास को आसेरा का क़िलेदार बनाया था। गोपालदास और उसके पुत्र विक्रम ने जहांगीर के विरुद्ध, बग़ावत के समय शहज़ादे ख़ुर्रम (शाहजहां) की ओर से लड़ाई लड़ी थी। इनके बाद गोपालदास का एक अन्य पुत्र विट्ठलदास मारोठ की गद्दी पर बैठा जो एक प्रतापी शासक साबित हुआ। विट्ठलदास को सन 1630 में रणथंभौर का शासक भी नियुक्त किया गया था।

शाहजहां ने तख़्त पर बैठने के बाद विट्ठलदास को सन 1660 में रणथंबोर का हाकिम बना दिया। सन 1640 में उन्हें आगरा का सूबेदार और क़िलेदार नियुक्त कर दिया था। विट्ठलदास के बेटे अर्जुन गौड़ के शासनकाल में मारोठ का काफ़ी विस्तार हुआ था।
सन 1653 में मारोठ में मिले एक जैन अभिलेख के अनुसार अर्जुन गौड़ के शासनकाल में,लालचंद ने भट्टारक चन्द्रकीर्ति से, जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना के लिए विशाल समारोह आयोजित करवाया था। साहित्यकार हितेश कुमार जैन के अनुसार इस क़स्बे में लम्बे समय तक जैन साधु-संतों का प्रभाव रहा था। यहां 11वीं-12वीं शताब्दी की कई जैन मूर्तियां मिली हैं
कई मंदिरों की छतों और स्तंभों पर असली सोने की गई “सुनहरी चित्रकारी” है। गौड़ शासकों को भवन बनवाने का शौक़ था। उन्होंने कई सुंदर भवन बनवाए। 14वीं शताब्दी का लक्ष्मीनारायण मंदिर, शिव मंदिर, नौलखा बाग़, सुंदर छतरियों, चबूतरों सहित अन्य कई धरोहर आज भी मौजूद हैं जिन्हें देखने के लिए दूर-दराज़ से पर्यटक आते हैं।

30/03/2025

शाहजहाँ ने अपने प्रिय पुत्र दारा के कहने पर औरंगजेब और मुराद को रोकने के लिए सेना भेजी। दोनों ब्रिगेडों को क्रमशः महाराजा जसवंत सिंह और कासिम खान के अधीन रखा गया। सेना ने 18 और 26 दिसंबर 1657 को आगरा छोड़ दिया ।

नर्मदा के तट पर लड़े गए धर्मतपुर के युद्ध में जसवंत सिंह ने औरंगजेब का विरोध किया था। यह युद्ध 15 अप्रैल 1658 को उज्जैन से पंद्रह मील दूर लड़ा गया था। जसवंत औरंगजेब पर हमला कर सकते थे लेकिन उन्होंने मुराद की सेनाओं को औरंगजेब में शामिल होने दिया। वह एक ही बार में दोनों मुगल राजकुमारों को हराना चाहते थे। हालांकि, देरी से औरंगजेब को फायदा हुआ। अब मुगल सेनापति कासिम खान, जिसे शाहजहाँ ने जसवंत की मदद के लिए भेजा था, को औरंगजेब ने अपने साथ शामिल होने के लिए राजी कर लिया। युद्ध शुरू होते ही कासिम खान ने दलबदल कर लिया। कोटा और बूंदी के मुकुंद सिंह हारा, दयाल दास झाला, राजगढ़ के अर्जुन गौड़ और रतलाम के रतन सिंह राठौर ने जसवंत की 30,000 राठौरों की सेना के साथ युद्ध के मैदान में बहादुरी से लड़ाई लड़ी "शाही राजकुमारों की अपार श्रेष्ठता के बावजूद, फ्रांसीसी सैनिकों द्वारा इस्तेमाल की गई कई तोपों की मदद से, रात ने ही राजपूतों के साहस के खिलाफ विज्ञान, संख्या और तोपखाने की प्रतियोगिता को रोक दिया"। युद्ध में दुर्गादास राठौर ने चार घोड़े बदले और घायल होने से पहले लगभग आधा दर्जन तलवारें खो दीं। संख्या विद्रोहियों के पक्ष में भारी थी। अंत में असमान मुकाबला विद्रोहियों की जीत के साथ समाप्त हुआ और औरंगजेब ने जीत की जगह का नाम फतेहाबाद रखा।
धरमत की जीत के बाद औरंगजेब आगे बढ़ा और 30 मई को सामूगढ़ में दारा को हरा दिया । उसने 8 जून 1958 को आगरा के किले पर कब्जा कर लिया और अपने पिता को पदच्युत कर खुद को सम्राट घोषित कर दिया। हार के बाद दारा मुल्तान और सिंध भाग गया। उसने दिल्ली की गद्दी के लिए नए सिरे से प्रयास किया और जसवंत सिंह के निमंत्रण पर फरवरी 1659 में अजमेर पहुंचा। औरंगजेब फतेहपुर के पास खजवा में शुजा से युद्ध करने के लिए व्यस्त था और अपनी राजधानी से दूर था। औरंगजेब अजमेर से चार मील दक्षिण में देवराई में दारा से मिलने के लिए वापस लौटा। जसवंत से क्रोधित होकर औरंगजेब ने मोहम्मद अमीर खान के नेतृत्व में दस हजार शाही सैनिकों की एक सेना तोपों और तोपखाने के साथ मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजी उन्होंने जयसिंह से जसवंत को मित्रता के लिए एक पत्र लिखने को कहा। जसवंत ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस बीच दारा युद्ध हार गया और केवल दो हज़ार अनुयायियों के साथ गुजरात की ओर पीछे हट गया। जयसिंह और बहादुर खान उसका पीछा करते हुए गए। जसवंत सिरोही से पहले जयसिंह के साथ मिल गया। गुजरात में सूखे के कारण दारा को कच्छ के रण के रास्ते सिंध भागने का समय मिल गया। दारा कंधार में सुरक्षित रहने के लिए जा रहा था, जब दादर के बलूच सरदार मलिक जीवन ने विश्वासघात करके दारा को पकड़ लिया और उसे जयसिंह को सौंप दिया। 10 नवंबर 1959 को जयसिंह की मध्यस्थता पर औरंगजेब ने जसवंत की महाराजा की उपाधि वापस कर दी।

30/03/2025

गौड़ाटी के महाराजा रघुनाथ सिंहजी पुनलौता के ठाकुर सांवलदास मेड़तिया का छोटा पुत्र व मीरा बाई के भाई व मेड़ता के राजा राव जयमल के पुत्र गोविन्ददास का पोता था। वह जयपुर के खास बारह कोटड़ी राजघराने बगरू के चत्रभुज राजवातों का भांजा था और उसकी दूसरी रानी रेवासा कि लाड्खानोत शेखावत राजकुमारी थी। वो दक्षिण में औरंगजेब के साथ था और उत्तराधिकार के उज्जैन और धोलपुर के युद्धों में भी उनके पक्ष में लड़ा था। उसने राजवात व शेखावत कछवाहों के साथ मिलकर संयुक्त शक्ति से गौडों के ठिकानों पर आक्रमण कर संवत 1717 (1659 ई) में उनकी पैत्रिक जागीरें छीन ली। मारोठ, पांचोता, पांचवा, लूणवा, मिठडी, भारिजौ, गोरयां, डूंगरयां, दलेलपुरो, घाटवौ, खौरंडी, हुडील, चितावा आदि को मेड़तीयों, राजवतों और शेखावतों ने बाँट लिया। तत्पश्चात बादशाह औरंगजेब ने महाराजा की पदवी व गौडावाटी का परगना ठाकुर रघुनाथ सिंह मेड़तिया को 140 गावों के वतन के रूप में दियागौड़ाटी के महाराजा रघुनाथ सिंहजी पुनलौता के ठाकुर सांवलदास मेड़तिया का छोटा पुत्र व मीरा बाई के भाई व मेड़ता के राजा राव जयमल के पुत्र गोविन्ददास का पोता था। वह जयपुर के खास बारह कोटड़ी राजघराने बगरू के चत्रभुज राजवातों का भांजा था और उसकी दूसरी रानी रेवासा कि लाड्खानोत शेखावत राजकुमारी थी। वो दक्षिण में औरंगजेब के साथ था और उत्तराधिकार के उज्जैन और धोलपुर के युद्धों में भी उनके पक्ष में लड़ा था। उसने राजवात व शेखावत कछवाहों के साथ मिलकर संयुक्त शक्ति से गौडों के ठिकानों पर आक्रमण कर संवत 1717 (1659 ई) में उनकी पैत्रिक जागीरें छीन ली। मारोठ, पांचोता, पांचवा, लूणवा, मिठडी, भारिजौ, गोरयां, डूंगरयां, दलेलपुरो, घाटवौ, खौरंडी, हुडील, चितावा आदि को मेड़तीयों, राजवतों और शेखावतों ने बाँट लिया। तत्पश्चात बादशाह औरंगजेब ने महाराजा की पदवी व गौडावाटी का परगना ठाकुर रघुनाथ सिंह मेड़तिया को 140 गावों के वतन के रूप में दिया
गौड़ाटी के महाराजा रघुनाथ सिंहजी पुनलौता के ठाकुर सांवलदास मेड़तिया का छोटा पुत्र व मीरा बाई के भाई व मेड़ता के राजा राव जयमल के पुत्र गोविन्ददास का पोता था। वह जयपुर के खास बारह कोटड़ी राजघराने बगरू के चत्रभुज राजवातों का भांजा था और उसकी दूसरी रानी रेवासा कि लाड्खानोत शेखावत राजकुमारी थी। वो दक्षिण में औरंगजेब के साथ था और उत्तराधिकार के उज्जैन और धोलपुर के युद्धों में भी उनके पक्ष में लड़ा था। उसने राजवात व शेखावत कछवाहों के साथ मिलकर संयुक्त शक्ति से गौडों के ठिकानों पर आक्रमण कर संवत 1717 (1659 ई) में उनकी पैत्रिक जागीरें छीन ली। मारोठ, पांचोता, पांचवा, लूणवा, मिठडी, भारिजौ, गोरयां, डूंगरयां, दलेलपुरो, घाटवौ, खौरंडी, हुडील, चितावा आदि को मेड़तीयों, राजवतों और शेखावतों ने बाँट लिया। तत्पश्चात बादशाह औरंगजेब ने महाराजा की पदवी व गौडावाटी का परगना ठाकुर रघुनाथ सिंह मेड़तिया को 140 गावों के वतन के रूप में दिया
धर्मत के युद्ध के बाद जब औरंगजेब दिल्ली की गड्डी पर बैठा तो रघुनाथ मेड़तिया को मारोठ का परगना इनाम में दे दिया क्योकी गौड़ आखिरी तक औरंगजेब के खिलाफ लड़ते रहे

20/07/2020

मालवा से विद्रोही पहाड़ सिंह गौर
1685 के शुरुआती महीनों में, पहर सिंह गौर, इंद्रकी के एक राजपूत जमींदार मालवा में फौजदार के रूप में सम्राट की सेवा कर रहे थे। वह एक मैच्योर बहादुरी का आदमी था और अपने सभी साथियों से आगे निकल गया।
लाल सिंह खिंची अपनी फौजदारी के अधिकार क्षेत्र के एक जमींदार थे जो अपने अधिपति अनुरुद्ध सिंह हाड़ा (बूंदी के राजा और मुगल बादशाह के सेनापति) के अधिकारों और उत्पीड़न से प्रेरित थे। राजा के जुल्मों को दबाने के लिए लाल सिंह ने अपनी बेटी की शादी उसके साथ पहाड़ सिंह गौर के साथ कर दी। पहर सिंह गौर 5000 लोगों के साथ अनुरुद्ध सिंह हाड़ा के पास पहुँचे और उन्होंने वीरता के गर्व में राजा द्वारा ठुकराए गए उत्पीड़ित व्रत से श्रद्धांजलि की माँग को छोड़ने के लिए उन्हें भेजा। एक भयंकर युद्ध के बाद, पहाड़ सिंह ने बूंदी राजा को हरा दिया और अपने सभी शिविरों को लूट लिया, जिसमें लाल सिंह को उनके उत्पीड़न के खतरे से मुक्त करने के लिए कई लाख की नकदी, संपत्ति, मवेशी, घोड़े और हाथी पकड़े गए।
मुग़ल बादशाह ने यह सुनकर पहाड़ सिंह को सारी लूट का माल भेजने का आदेश दिया, उज्जैन प्रांत के गवर्नर को एक पत्र भेजा गया, जिसमें उसने कहा कि पहाड़ सिंह को उसकी उपस्थिति के लिए बुलाया जाए, उससे अनुरुद्ध सिंह की खोई हुई संपत्ति छीन ली जाए और उसे भेजी जाए। शाही दरबार। पहाड़ सिंह गौर ने आज्ञा का पालन करने से इनकार कर दिया और मुगलों के खिलाफ लूट और विद्रोह का जीवन अपना लिया। औरंगज़ेब ने पहर सिंह को दंड देने के लिए राय मलूक चंद को एक शाही पत्र भेजा, एक बड़ी और मजबूत सेना की कमान मलूक चंद ने संभाली और एक गंभीर बंद तिमाही की लड़ाई के बाद, पहाड़ सिंह गौर सिरोंज से 28 मील दक्षिण पश्चिम में उदयपुर के एक गाँव में मारे गए। ।
मुगल के खिलाफ पहाड़ सिंह का विद्रोह उसके साथ समाप्त नहीं हुआ था। उनके बेटे भगवत सिंह ने एक क्रूर ग्रामीणों के एक बड़े शरीर को इकट्ठा किया, कई परगनों को लूटा और सम्राट के लोगों के मार्ग में एक चट्टान बन गए। कई प्रयासों के बाद, शाही सेना ने उसे मार डाला और विद्रोह को समाप्त करने की घोषणा की। हालाँकि 1690 में, देवी सिंह गौर के एक और पुत्र पहाड़ सिंह ने छत्रसाल बुंदेला को लड़ाई में शामिल किया और मुगल क्षेत्र को लूटना शुरू कर दिया। पहर सिंह के पोते गोपाल सिंह भी विद्रोही में शामिल हो गए और इंद्राक्षी किले पर कब्जा कर लिया, औरंगजेब को सफदर खान को भेजने के लिए मजबूर किया। सफदर खान ने किले की घेराबंदी कर दी और एक रात के हमले के दौरान वह पकड़ा गया और मारा गया, मुग़ल भाग गए।

19/07/2020

सांस्कृतिक-झरोखा
‘सांगो’ई गौड़ सिरेह’

चलते चलते रात होने को आई थी | कवि ईसरदासजी गुजरात के नागरचाळा ग्राम में पहुँच गए थे | उन्होंने देखा गवाड़ में टाबर खेल रहे थे | एक किशोर से उन्होंने पूछा – यहाँ कोई राजपूत की कोटड़ी है ? किशोर ने ईसरदासजी की ओर देखा तथा उपहासात्मक लहजे में बोला – आगे सांगजी गौड़ की कोटड़ी है |
यह मध्यकाल की घटना है | दिल्ली में तब शेरशाह सूरी था और मारवाड़ में राव मालदेव | तब चारण रात्रि-विश्राम राजपूत के यहीं करते थे | चारणों को तब देवी-पुत्र कहते थे और राजपूत देवी उपासक थे | यह रिश्ता अटूट था | ईसरदासजी ने इसीलिए यहाँ कोई राजपूत की कोटड़ी है , पूछा था | कोटड़ी कोट-किले शब्द का ही छोटा रूप होता है, भले ही वह साधारण झोंपड़ा ही क्यों न हो ? वह अतिथि-गृह होता था |
ईसरदासजी गाँव में पूछते-पूछते गाँव से बाहर आ गये | उनको सांगजी गौड़ की कोटड़ी नहीं मिली | गाँव के बाहर वे खड़े हो गए | उन्हें वहां एक झोंपड़ी दिखाई दी | वे झोंपड़ी के पास गए, तो उन्हें वहां एक विधवा राजपूत महिला दिखीं | उन्होंने उस बुजुर्ग महिला से सांगजी गौड़ की कोटड़ी का पता पूछा | सुनकर महिला मुस्कराई और ईसरदासजी से बोली- यही सांगे की कुटिया है बापजी! आप कहाँ से पधारे हैं ?
मारवाड़ के भादरेस गाँव से आया हूँ माँ, चारण हूँ , रात बिसराम करके आगे जाना है |
मेरे धन-भाग जो आप पधारे | मेरी तो कुटिया ही पवित्र हो गई बापजी ! आप विराजें | सांगा आता ही होगा, वह गाँव के बछड़े चराता है |
ईसरदासजी सब कुछ समझ गए | गाँव के लोगों ने उनका उपहास किया था | साथ ही विधवा और उसके पुत्र का भी उपहास | पर वे भक्त थे, कवि थे | उन्होंने सुबह आगे की यात्रा पर रवाना होने से पहले जो कहा, वह दोहा सदियों से राजस्थान और गुजरात में जन-जन की जुबान पर है –
‘ दीनां री देवळ चड़ै, क्यूँ कोई रीस करेह |
नागरचाळां ठाकरां ,(थांमें) सांगो ई गौड़ सिरेह ||
( जो देते हैं , अर्थात जो उत्सर्ग करते हैं, उनकी ही देवलियां स्थापित होती है, इससे किसी को नाराज नहीं होना चाहिए | हे नागरचाळा के ठाकुरों ! कान खोल कर सुन लो, तुम सब में यह सांगा गौड़ श्रेष्ठ है | )
आज न सांगा गौड़ है, न संत-प्रवर ईसरदास | आज नागरचाळा के ठाकुरों के तो नाम ही काल के गाल में समा गए हैं , पर सांगा गौड़ ज़िंदा है | जब भी पांच व्यक्ति इक्कठे होते हैं, कोई लौकिक ज्ञान चर्चा चलती है तो बछड़े की पूंछ पकड़ा उस विधवा राजपूतानी का बालक सांगा गौड़ सदियों की सरहदें लांघता आकर उपस्थित हो जाता है| और तब ईसरदास की ललकार गूँज उठती है -- नागरचाळां ठाकरां ,(थांमें) सांगो ई गौड़ सिरेह ||

21/09/2017

आठवीं शती के मध्य में उत्तरी भारत में अन्य महत्त्वपूर्ण जिस साम्राज्य की स्थापना हुई उसका संस्थापन बंगाल के पालों द्वारा हुआ था।

इस वंश का इतिहास हमें निम्नलिखित साहित्य और उनके अभिलेखों से ज्ञात होता है। प्रमुख अभिलेख निम्नलिखित हैं:

1. धर्मपाल का खालिमपुर अभिलेख

2. देवपाल का मुंगेर अभिलेख

3. नारायणपाल का बादल स्तंभ लेख

4. महिपाल प्रथम का वाणगढ़ तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त अभिलेख इसके अतिरिक्त संध्याकर नदी के रामपालचरितसे पाल वंश के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।

पहले बंगाल का प्रान्त मगध राज्य में सम्मिलित था। नन्दों के समय में भी बंगाल मगध साम्राज्य के अन्तर्गत था। मगध के राजसिंहासन पर बैठनेवाला सम्राट् बंगाल का भी स्वामी होता था। छठी शताब्दी के उत्तराद्ध में गौड़ अथवा बंगाल स्वतन्त्र हो गया और गुप्त-साम्राज्य से पृथक् हो गया। शशांक के समय में, जो हर्ष का समकालीन था, बंगाल की शक्ति काफी बढ़ गई। यद्यपि सम्राट् हर्ष और आसाम के भास्करवर्मन ने गौड़ाधिपति की शक्ति को रोकने का बहुत प्रयास किया और उसको युद्ध में पराजित करने की भी चेष्टा की तथापि उसके जीवन-काल में न तो वे उसकी शक्ति ही कम कर सके और न उसको कुछ क्षति ही पहुंचा सके। परन्तु शशांक की मृत्यु के बाद, बंगाल की राजनैतिक एकता और सार्वभौमिकता विनष्ट हो गई। अब सम्राट् हर्षवर्द्धन और कामरूपाधिपति भास्करवर्मन दोनों को अवसर प्राप्त हो गया और उन्होंने बंगाल पर आक्रमण करके इसकी सम्भवत: दो भागों में विभक्त कर दिया, जिनको उन्होंने आपस में बांट लिया। आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में शैल वंश के एक राजा ने पोण्ड या उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया। कश्मीर-नरेश ललितादित्य मुक्तापीड और कन्नौज-नरेश यशोवर्मन ने भी बंगाल पर आक्रमण किया था। मगध के अनुवर्ती गुप्त नरेश का बंगाल पर अधिकार था किन्तु यह अधिकार नाममात्र को ही था। किन्तु इस नरेश के हट जाने पर यह नाममात्र का अधिकार भी नहीं रह गया। कामरूप-नरेश हर्षदेव ने अवसर पाकर बंगाल को विजित कर लिया। एक दृढ़ शासन-शक्ति के अभाव में बंगाल अव्यवस्था और अराजकता का केन्द्र हो। गया। आक्रमणों के इस तांते ने बंगाल में चारों ओर अशान्ति एवं गड़बड़ी फैला दी जिससे ऊबकर सारे सरदारों और जनता ने मिलकर गोपाल नामक व्यक्ति को अपना राजा चुन लिया। गोपाल को सम्पूर्ण बंगाल का शासक स्वीकार कर लिया गया।

गोपाल- आठवीं शताब्दी के प्रथमाद्ध में गोपाल ने बंगाल का शासन संभाला। गोपाल ने बंगाल में हिमालय से लेकर समुद्र-तट तक सम्पूर्ण राज्य को सुसंगठित किया और विगत डेढ़ शताब्दियों की अराजकता और अव्यवस्था का अन्त करके समस्त बंगाल में शान्ति स्थापित की। उसने नालन्दा के निकट ओदन्तपुरी नामक स्थान पर एक विश्वविद्यालय की स्थापना कराई। गोपाल ने अपनी मृत्यु (770 ई.) के समय अपने उत्तराधिकारी के लिए एक समृद्ध और सुशासित राज्य छोड़ा। उसके उत्तराधिकारियों ने बंगाल को राजनैतिक उत्कर्ष और सांस्कृतिक गौरव की उस पराकाष्ठा पर पहुँचाया जिसकी उसने पहले कभी स्वप्न में भी कल्पना न की होगी। धर्मपाल के खालिमपुर अभिलेख में कहा गया है कि मत्स्य न्याय से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों (सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण करवायी। गोपाल के बाद धर्मपाल बंगाल का राजा हुआ।

धर्मपाल- धर्मपाल पाल वंश की वास्तविक महत्ता का संस्थापक था। धर्मपाल एक सुयोग्य और कर्मनिष्ठ शासक था जिसने अपने राज्य की सीमा सोन नदी के पश्चिम तक बढ़ा दी। धर्मपाल धार्मिक मनोवृत्ति का था और अपने पिता की भांति बौद्ध था, फिर भी राजनैतिक दृष्टि से वह भी महत्वाकांक्षी था। तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने लिखा है कि धर्मपाल के राज्य का विस्तार पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में जालंधर और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक था। सम्भव है कि तारानाथ का यह कथन अत्युक्तिपूर्ण हो परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि समस्त उत्तरी भारत में धर्मपाल की शक्ति का प्रभाव जमा हुआ था। 11वीं सदी के गुजराती कवि सोड्डल ने धर्मपाल कोउत्तरापथस्वामी कहा है। उसने महाराजाधिराज, परमेश्वरऔर परम भट्टारक की उपाधियाँ धारण की। वह एक उत्साही बौद्ध था और उसे परमसौगत कहा गया है।

धर्मपाल ने लगभग 46 वर्षों तक राज्य किया। उसने विक्रमशिला और सोमपुर में बौद्ध विहारों का निर्माण कराया। विक्रमशिला में एक विश्वविद्यालय की स्थापना भी उसने कराई थी। विक्रमशिला में भी नालन्दा की भांति विद्या का एक बहुत बडा केन्द्र स्थापित हो गया था। धर्मपाल ने अपने राज्य में अन्य कई मन्दिरों और बौद्ध विहारों का निर्माण भी कराया था। उसकी राज्यसभा में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरिभद्र रहता था। उसके समय प्रसिद्ध यात्रीसुलेमान आया था। उसके समय में धीमन और विटपाल ने एक नए कला संप्रदाय का प्रवर्त्तन किया। धर्मपाल का 810 ई. में शरीरान्त हो गया।

देवपाल- पाल वंश का देवपाल तृतीय राजा था। अपने वंश का यह एक शक्तिशाली राजा था। उसने अड्तालीस वर्षों तक राज्य किया और कदाचित् मुद्गगिरि (मुंगेर) को अपनी राजधानी बनाया। उसके सेनापति लवसेन ने आसाम और उड़ीसा पर विजय प्राप्त की। देवपाल ने अपने पिता की प्रसार-नीति को जारी रखा। अपने अभिलेखों में वह एक साम्राज्यवादी के रूप में मुखरित हुआ है। यह सम्भव है कि देवपाल ने राष्ट्रकूट-नरेश गोविन्द-तृतीय की मृत्यु से लाभ उठाया। गोविन्द-तृतीय के देहावसान से राष्ट्रकूट राज्य में गड़बड़ फैल गई जिससे देवपाल को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया। उसके अभिलेखों में उसकी सुदूरव्यापिनी विजयों का उल्लेख किया गया है। एक अभिलेख में कहा गया है कि वह हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यवर्ती सम्पूर्ण प्रदेश का स्वामी था और दक्षिण में उसने सेतुबन्ध रामेश्वरम् तक विजय प्राप्त की। परन्तु स्पष्ट है कि अभिलेख का यह कथन केवल प्रशस्तिवादन है और ऐतिहासिक तथ्य से नितान्त दूर है। एक अन्य स्तम्भ-लेख में यह उल्लेख मिलता है कि अपने मन्त्रियों दर्भपाणि तथा केदार मिश्र की नीतियुक्त मंत्रणा से प्रेरित होकर देवपाल ने उत्कल जाति को मिटा दिया, हूण का दर्प चूर कर दिया और द्रविड़ तथा गुर्जर के राजाओं का गर्व धूलधुसरित कर दिया। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी का मत है कि- बादल स्तम्भ-लेख का यह कथन सम्भवतः सही है। देवपाल के पिता धर्मपाल ने केवल थोडे ही दिनों तक सम्राट् के रूप में शासन किया, किन्तु देवपाल ने कुछ अधिक काल तक अपनी सम्राटोचित सत्ता प्रमाणित की। उड़ीसा और आसाम पर उसका अधिकार हो जाने से उसका राज्य काफी विस्तृत हो गया। समकालीन नरेशों के बीच देवपाल की प्रतिष्ठा काफी जम गई, किन्तु प्रतिहार-नरेश मिहिरभोज के राज्यारोहण से गुर्जरों की साम्राज्यवादिता का उदय हुआ जो महेन्द्रपाल की मृत्यु तक बनी रही। इस प्रबल साम्राज्यवादिता के सामने बंगाल के पालों की कुछ न चल सकी और उनको अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षायें त्यागनी पड़ीं। कुछ विद्वानों का मत है कि बादल स्तम्भ-लेख में गुर्जर के राजा का गर्व चूर्ण करने का जो उल्लेख प्राप्त है, वह सम्भवत: गुर्जर नरेश मिहिरभोज के लिए है। यदि यह मत ठीक हो तो यह मानना पड़ेगा कि देवपाल के समय में पालों की शक्ति का ह्रास नहीं हुआ था किन्तु उसके उत्तराधिकारियों के शासन-काल में उसके वंश की राजनैतिक शक्ति निस्सन्देह घटने लगी थी। देवपाल का सुमात्रा और जावा के नरेश के साथ दौत्य सम्बन्ध (Diplomatic Relation) था। देवपाल के समय में बंगाल निश्चय ही एक शक्तिशाली राज्य था।

अपने पिता की भाँति देवपाल भी एक उत्साही बौद्ध था। उसे भी परमसौगत कहा गया है। नालन्दा ताम्रपत्रों से विदित होता है कि शैलेन्द्र वंश के शासक बापुत्रदेव के अनुरोध पर देवपाल ने राजगृह-विषय में चार और गया-विषय में एक गांव धर्मार्थ दान दिये थे। उसने सुमात्रा के नरेश बलपुत्रदेव को नालन्दा के समीप एक बौद्ध विहार बनवाने की अनुमति प्रदान कर दी थी और स्वयं भी इस कार्य के लिए प्रचुर धन दान किया था। देवपाल के लम्बे शासन-काल से बंगाल में एक विशिष्ट संस्कृति के विकास को संरक्षण मिला। देवपाल ने मगध की बौद्ध प्रतिमाओं का पुनर्निर्माण कराया और उसके राज-आश्रय ने वास्तु तथा अन्य कलाओं को पनपने का अवसर प्रदान किया। बोधिगया अथवा महाबोधि के मन्दिर के निर्माण में भी देवपाल का योग था। वह विद्या का उदार संरक्षक था और उसकी राजसभा बौद्ध विद्वानों के लिए एक आश्रय-स्थल के रूप में हो गई। बौद्ध कवि दत्तउसकी राजसभा में रहता था और उसने लोकेश्वर शतकनामक सुप्रसिद्ध काव्य की रचना की थी, जिसमें लोकेश्वर का विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है और लोकेश्वर अथवा अवलोकेश्वर के प्रेम और क्षमा आदि गुणों की स्तुति है। उसने नगरहार के प्रसिद्ध विद्वान् वीरदेव को सम्मान दिया और उसे नालंदा विहार का अध्यक्ष बनवाया। देवपाल की राजसभा में मलाया के, शैलेन्द्र वंशीय शासक बालपुत्र देव ने अपना एक दूत भेजा था। देवपाल के समय वास्तुकला की अच्छी उन्नति हुई। डॉ. मजूमदार के शब्दों में धर्मपाल और देवपाल का शासन-काल बंगाल के इतिहास में एक उत्कृष्ट अध्याय था।

नारायण पाल- देवपाल के बाद बंगाल के राज्य पर कई छोटे-छोटे राजाओं ने राज्य किया परन्तु उनके शासन की अवधि बहुत अल्प थी। नारायण पाल अपने वंश का एक शक्तिशाली नरेश था, जिसने कम से कम 54 वर्ष राज्य किया। अपने पूर्वजों के विपरीत नारायण पाल शैव धर्म का अनुयायी था और उसने बाहर से शैव संन्यासियों को अपने राज्य में आमन्त्रित किया था। अपने शासन-काल के प्रारम्भिक वर्षों में नारायण पाल ने शिव के एक हजार मन्दिरों का निर्माण कराया और उनका प्रबन्ध उसने इन पाशुपत आचार्यों के सुपुर्द कर दिया। इन आचार्यों को उसने दान में गांव भी दिये। पहले कुछ दिनों तक नारायण पाल का मगध पर अधिकार बना रहा किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि बाद में मगध प्रतिहारों के राज्य में चला गया। 900 ई. में नारायण पाल का शरीरान्त हो गया।

महीपाल-प्रथम- नारायण पाल के बाद उसका पुत्र राज्यपाल शासनाधिकारी हुआ किन्तु उसके समय में गुर्जर-पाल-संघर्ष में पालों की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। गोपाल-द्वितीय और विग्रहपाल-द्वितीय (935-992) के समय में पालों की शक्ति कुछ अंशों में बढ़ गई। राज्यपाल के समय में काम्बोज नामक पर्वतीय लोगों ने बंगाल के कुछ भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था किन्तु महीपाल (990-1030) ने काम्बोजों को निकाल बाहर किया। महीपाल-प्रथम ने पर्याप्त अंशों तक अपनीविचलितकुललक्ष्मी का स्तम्भन किया। अपने राज्यारोहण के ही वर्ष उसने सम्पूर्ण मगध, तीरभुक्ति और पूर्वीय बंगाल को विजित किया। महीपाल-प्रथम के राज्य-काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी चोलों का आक्रमण। राजेन्द्र चोल के एक सेनानायक ने उड़ीसा के मार्ग से होकर बंगाल पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण का महीपाल-प्रथम ने सामना किया, परन्तु चोल सेना ने उसे पराजित कर दिया। फिर भी पाल नरेश ने उसे गंगापार न बढ़ने दिया। इस पराजय के द्वारा पाल साम्राज्य को क्षति अवश्य ही पहुंची होगी। इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि महीपाल प्रथम के शासन-काल के उत्तराद्ध में उसके राज्य की सीमायें संकुचित हो गई थीं।

बंगाल के शासकों में महीपाल काफी प्रसिद्ध है। आज भी उसकी प्रशंसा में गीत गाये जाते हैं और उल्लेखनीय बात तो यह है कि ये गीत लोकप्रिय भी हैं। उसके राजस्व-काल में बंगाल का राज्य समृद्ध था। कला की उन्नति हुई तथा इसका रूप सुधर गया। मूर्ति-कला को एक अभिनव भंगिमा तथा मुद्रा प्राप्त हो। गई। नालन्दा के विशाल बुद्ध-मन्दिर का पुनर्निर्माण महीपाल-प्रथम के शासन के 11वें वर्ष में कराया गया था। बनारस के बौद्ध मन्दिरों की, उसके सम्बन्धियों, स्थिरपाल और बसन्तपाल ने मरम्मत कराई थी। महीपाल-प्रथम के ही समग्र शासन में मगध से धर्मपाल तथा अन्य धर्माचार्यों ने आमंत्रण मिलने पर तिब्बत की यात्रा की थी और वहाँ पर उन्होंने बौद्ध धर्म को सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने का प्रयत्न किया। अपनी उपलब्धियों के कारण महिपाल प्रथम, पाल साम्राज्य का दूसरा संस्थापक माना जाता है। महीपाल के सुदीर्घ-कालीन शासन के उपरान्त नयपाल पाल वंश के राज्य का स्वामी हुआ।

नयपाल- बहुत थोड़े ही समय तक नयपाल को राज्य करने का अवसर में हिन्दुओं का तीर्थस्थान गया एक भव्य और शानदार नगर के रूप में हो गया। गया जिले के शासक विश्वरूप ने नयपाल के शासन के पन्द्रहवें वर्ष में विष्णु के पदचिन्हों के निकट कई मंदिर बनवाए। नेपाल के शासन के अंतिम दिनों में मगध पर विख्यात चेदी नरेश कर्ण ने आक्रमण कर दिया।

नायपाल के बाद 1055 ईं में उसका पुत्र विग्रहपाल-तृतीय राजा हुआ। विग्रहपाल-तृतीय यद्यपि एक बौद्ध श्रद्धालु था तथापि उसने सूर्यग्रहण अठाव चंद्रग्रहण के अवसर पे एक बार गंगा में स्नान किया और सामवेद के पंडित ब्राह्मण को एक ग्राम दान में दिया। इसी नरेश के समय में चालुक्य राजा

विक्रमादित्य ने बंगाल और आसाम पर चढ़ाई की। विग्रहपाल-तृतीय के समय में पाल साम्राज्य हासोन्मुख हो चला था। उसकी मृत्यु ने उसके राज्य की स्थिति को और अधिक जटिल कर दिया।

विग्रहपाल-तृतीय के उत्तराधिकारी- विग्रहपाल-तृतीय की मृत्यु के बाद बंगाल में गृहयुद्ध छिड़ गया। उसके तीन पुत्र थे, महीपाल-द्वितीय, सूरपाल और रामपाल। महीपाल-द्वितीय सिंहासनारूढ़ हुआ और उसने अपने भाइयों सूरपाल तथा रामपाल को बन्दी बना लिया। कैवर्त नामक एक कबीले ने महीपाल के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया और उसे निकाल बाहर कर दिया। विद्रोहियों के साथ लड़ते हुए महीपाल रणभूमि में मारा गया। अब सूरपाल सिंहासन का अधिकारी हुआ, किन्तु उसके समय में भी अनेक सामन्तों ने विद्रोह कर दिया। अपने भाइयों में रामपाल सबसे अधिक पराक्रमी और योग्य निकला। रामपाल ने अपने वश के समर्थकों की सहायता से सिंहासन पर अधिकार कर लिया और कैवर्त नामक विद्रोही कबीले को पराजित किया। अपनी विजय-स्मृति को स्थायी बनाने के लिए रामपाल ने रामवती नामक नगरी की स्थापना की।

रामपाल को इस बात का श्रेय प्रदान किया गया है कि उसने आसाम तथा अन्य राज्यों पर भी विजय प्राप्त की। सान्ध्यक कारनन्दी ने रामपालचरित् नामक ग्रन्थ में रामपाल के जीवन-चरित का वर्णन किया है। रामपाल ने उत्तरी बंगाल पर भी विजय प्राप्त की और कलिंग पर आक्रमण किया। इन विजयों से पाल साम्राज्य की स्थिति कुछ सुधर गई परन्तु शीघ्र ही फिर साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया वेगवती हो गयी। लगभग 1120 ई. में रामपाल का देहान्त हो गया। अपने पिता की मृत्यु के उपरान्त कुमारपाल सिंहासन पर बैठा। इसके उपरान्त क्रमशः गोपाल तृतीय, मदन लाल तथा गोविन्दपाल सिंहासन पर बैठे। गोविन्दपाल पाल राजवंश का अन्तिम शासक था। उसकी मृत्यु के साथ पाल राजवंश का अन्त हो गया। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी के शब्दों में- इस प्रकार भाग्य के उलट-फेर के साथ बिहार और बंगाल पर 400 वर्षों तक शासन करने के उपरान्त पाल नरेश ऐतिहासिक मंच से अलग हो गए।

पाल साम्राज्य का पतन- पाल साम्राज्य की स्थिति रामपाल के बाद और अधिक डावांडोल हो गई। उसके पुत्र कुमारपाल के समय में आसाम स्वतन्त्र हो गया। उसका पुत्र गोपाल-तृतीय मदनपाल के द्वारा मार डाला गया। मदनपाल का अधिकार दक्षिणी बिहार-पटना और मुंगेर तक विस्तृत था। उसके पश्चात् गोविन्दपाल शासक हुआ जिसका अधिकार केवल गया तक सीमित रह गया। गोविन्दपाल गहड़वालों और सेनों के बीच घिर गया। दोनों ओर से घिर जाने पर पाल साम्राज्य की स्थिति बड़ी ही शोचनीय हो गई। पाल नरेश नाममात्र को ही राजा रह गये। सेन वंश के उत्कर्ष, सामन्तों के विद्रोह और परवर्ती पाल नरेशों की अयोग्यता के कारण पालों के साम्राज्य का पतन हो गया।

पाल शासन का महत्त्व- भारत के उन राजवंशों के इतिहास में पाल वंश का शासन-काल काफी महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने सबसे अधिक दिनों तक राज्य किया। पाल नरेशों ने चार शताब्दियों तक बंगाल के राज्य पर शासन किया। धर्मपाल और देवपाल के शासन-काल का समय एक शताब्दी से अधिक था। उन्होंने इस सुदीर्घकालीन शान में बंगाल को उत्तर भारत के सबसे अधिक शक्तिशाली राज्यों में से एक बना दिया। साम्राज्य सत्ता के लिए उत्तर भारत में जिन तीन राजनैतिक शक्तियों के बीच संघर्ष हुआ उसमें से एक शक्ति पालों की भी थी। धर्मपाल और देवपाल के उत्तराधिकारियों के समय में यद्यपि पालों की शक्ति वैसी नहीं रही तथापि उनका राज्य इस समय भी उपेक्षित नहीं था। जिस समय पाल-साम्राज्य अपने उत्कर्ष की स्थिति में नहीं था उस समय भी इसका प्रभाव दूर-दूर तक के प्रान्तों के अधीन रहा।

पर पालों का शासन राजनैतिक दृष्टिकोण की अपेक्षा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रोफेसर एन.एन. घोष के शब्दों में- पाल शासन के अन्तर्गत न केवल बंगाल की गणना सबसे बढ़ी-चढ़ी शक्तियों में की जाने लगी, अपितु वह बौद्धिक और कला-सम्बन्धी क्षेत्रों में उत्कृष्ट हो गया। प्रसिद्ध चित्रकार, शिल्पी एवं कांस्य की प्रतिमा गढ़ने वाले धीमान् और वित्पाल पाल साम्राज्य में ही राज्याश्रय पाकर अपनी कला के निर्माण में संलग्न रहे।

कला के क्षेत्र में पाल नरेशों का बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान था। उनके शासन-काल में विकसित होने वाली कला-परम्परा की जीवनी-शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसका प्रभाव भारत के बाहर दक्षिण-पूर्वी देशों में भी पहुंचा। नवीं शताब्दी में धीमान् और उसके पुत्र वित्पाल ने चित्रकला की जिस परम्परा को जन्म दिया, वह ग्यारहवीं शताब्दी में भी जारी रही। यद्यपि पाल युग की बौद्ध कला में ह्रास के कुछ लक्षण अवश्य विद्यमान हैं तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि भारतीय बौद्ध धर्म की अन्तिम छ: शताब्दियां कलात्मक बन्ध्यापन का युग प्रस्तुत करती हैं। सारे बंगाल और बिहार में पाल नरेशों ने चैत्यों, बिहारों, मन्दिरों और मूर्तियों का निर्माण कराया। अभाग्यवश उस काल की इमारत कोई बची न रह सकी परन्तु सरों और नहरों की एक बृहत् संख्या आज भी सुरक्षित है जिससे पाल राजाओं की निर्माण-सक्रियता का पता चलता है।

पालों की शिक्षा और धर्म के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण देन थी। ओदन्तपुरी और विक्रमशिला के विश्वविद्यालयों की स्थापना पाल-नरेशों ने ही की थी। नालन्दा की भाँति इन विश्वविद्यालयों का यश भी देश के दूरवर्ती भागों तक फैला हुआ था और दूर-दूर के विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए यहां आया करते थे। शिक्षा के संरक्षण और प्रसार में इन बौद्ध विश्वविद्यालयों का काफी महत्त्वपूर्ण योगदान था। दो-एक नरेशों को छोड़कर शेष सभी पाल नृपति बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने बौद्ध धर्म को उस समय राज्याश्रय प्रदान किया जिस समय देश के अधिकांश क्षेत्रों में यह पतनोन्मुख था। पाल नरेशों ने अपने राज्य में बौद्ध धर्म के प्रचार का पूरा प्रयत्न किया परन्तु उनका धार्मिक दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं था। वे ब्राह्मणों को भी दान-दक्षिणा देकर सम्मानित करते थे। बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ अतीश नामक प्रसिद्ध दार्शनिक भिक्षु ने तिब्बत की यात्रा की थी। पालों के शासन-काल में साहित्य की उन्नति उतनी अधिक तो नहीं हुई जितनी की कला की किन्तु सन्ध्याकार नन्दी कारामपालचरित् नामक श्लेषात्मक महाकाव्य इसी समय लिखा गया। लोकेश्वर-शतक नामक काव्य की रचना बौद्ध कवि वज्रदत ने देवपाल के समय में की थी। इस प्रकार हम देखते है कि संस्कृत के संरक्षण और विकास की दृष्टि से पालों का शासन-काल काफी महत्त्वपूर्ण था। परन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि पालों के ही शासन-काल में बौद्ध धर्म के उस विकृत रूप का विकास हुआ जिसने भारतवर्ष में बौद्ध धर्म के लोप को अवश्यम्भावी बना दिया। बौद्ध विहारों में वज्रयान और तान्त्रिक अभिचारादि के रूप में व्यभिचार, विलासिता तथा सुरा-सेवन आदि दुर्गुण प्रविष्ट हो गये।धर्मपाल और अतिस दीपांकर जैसे विद्वान भी इसी काल में हुए।

21/09/2017

आफ़ग़ानिस्तान

पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक। पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र। इसे आधुनिक कंदहार से जोड़ने की ग़लती कई बार लोग कर देते हैं जो कि वास्तव में इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था। इस प्रदेश का मुख्य केन्द्र आधुनिक पेशावर और आसपास के इलाके थे। इसमहाजनपद के प्रमुख नगर थे - पुरुषपुर (आधुनिक पेशावर) तथा तक्षशिला इसकी राजधानी थी । इसका अस्तित्व 600 ईसा पूर्व से 11वीं सदी तक रहा। कुषाण शासकों के दौरान यहाँ बौद्ध धर्म बहुत फला फूला पर बाद में मुस्लिम आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया।

प्राचीन नाम



गांधार महाजनपद

गांधार, थाइलैंड या स्याम के उत्तरी भाग में स्थित युन्नास का प्राचीन भारतीय नाम है। चीनी इतिहास–ग्रंथों से सूचित होता है। कि द्वितीय शती ई. पू. में ही इस प्रदेश में भारतीयों ने उपनिवेश बसा लिए थे और ये लोग बंगाल- असम तथा ब्रह्मदेश के व्यापारिक स्थलमार्ग से यहाँ पहुँचे थे। 13वीं शती तक युन्नान का भारतीय नाम गंधार ही प्रचलित था, जैसा कि तत्कालीन मुसलमान लेखक रशीदुद्दीन के वर्णन से सूचित होता है। इस प्रदेश का चीनी नाम नानचाओं था। 1253 ई. मेंचीन के सम्राट कुबलाख़ाँ ने गंधार को जीतकर यहाँ के हिन्दू राज्य की समाप्ति कर दी।

इस प्रदेश का उल्लेख महाभारत और अशोक के शिलालेखों में मिलता है। महाभारत के अनुसार धृतराष्ट्र की रानी औरदुर्योधन की माता गांधारी गंधार की राजकुमारी थीं। आजकल यह पाकिस्तान के रावलपिंडी और पेशावर ज़िलों का क्षेत्र है। तक्षशिला और पुष्कलावती यहीं के प्रसिद्ध नगर थे। अशोक के साम्राज्य का अंग रहने के बाद कुछ समय यह फारस के और कुषाण राज्य के अंतर्गत रहा। यह पूर्व और पश्चिम के सांस्कृतिक संगम का स्थल था और यहाँ कला की 'गांधार शैली' का जन्म हुआ।

सिंधु नदी के पूर्व और उत्तरपश्चिम की ओर स्थित प्रदेश। वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी भाग भी इसमें सम्मिलित था। ऋग्वेद में गंधार के निवासियों को गंधारी कहा गया है तथा उनकी भेड़ो के ऊन को सराहा गया है और अथर्ववेद में गंधारियों का मूजवतों के साथ उल्लेख है-

'उपोप मे परामृश मा में दभ्राणिमन्यथा:,

सर्वाहमस्मि रोमशा गंधारीणामिवाविका'[1]

'गंधारिम्यों मूजवद्भ्योड् गेभ्यो मगधेभ्य:

प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं परिदद्मसिं [2]

अथर्ववेद में गंधारियों की गणना अवमानित जातियों में की गई है किंतु परवर्ती काल में गंधारवासियों के प्रति मध्यदेशीयों का दृष्टिकोण बदल गया और गंधार में बड़े विद्वान पंडितों ने अपना निवास-स्थान बनाया। तक्षशिला गंधार की लोकविश्रुत राजधानी थी।



बुद्ध की पूजा करते हुए इंद्र और ब्रह्मा, कला संस्थान शिकागो

छान्दोग्य उपनिषद में उद्दालक-अरुणि ने गंधार का, सद्गुरु वाले शिष्य के अपने अंतिम लक्ष्य पर पहुंचने के उदाहरण के रूप में उल्लेख किया है। जान पड़ता है कि छांदोग्य के रचयिता का गंधार से विशेष रूप से परिचय था।

शतपथ ब्राह्मण [3] तथा अनुगामी वाक्यों में उद्दालक अरुणि का उदीच्यों या उत्तरी देश (गंधार) के निवासियों से संबंध बताया गया है। पाणिनि ने जो स्वयं गंधार के निवासी थे, तक्षशिला का [4] उल्लेख किया है। ऐतिहासिक अनुश्रुति मेंकौटिल्य को तक्षशिला महाविद्यालय का ही रत्न बताया गया है। वाल्मीकि ने रामायण [5] में गंधर्वदेश की स्थिति गांधार विषय के अंतर्गत बताई गई है। कैकय देश इस के पूर्व में स्थित था। केकय-नरेश युधाजित के कहने से अयोध्यापतिरामचंद्र जी के भाई भरत ने गंधर्व देश को जीतकर यहाँतक्षशिला और पुष्कलावती नगरियों को बसाया था।

महाभारत काल में गंधार देश का मध्यदेश से निकट संबंध था। धृतराष्ट्र की पत्नी गंधारी, गंधार की ही राजकन्या थी।शकुनि इसका भाई था। जातकों में कश्मीर और तक्षशिला-दोनों की स्थिति गंधार में मानी गई है। जातकों में तक्षशिला का अनेक बार उल्लेख है। जातककाल में यह नगरी महाविद्यालय के रूप में भारत भर में प्रसिद्ध थी। पुराणों में[6] गंधार नरेशों को द्रुहयु का वंशज माना। वायु पुराण में गंधार के श्रेष्ठ घोड़ों का उल्लेख है।

अंगुत्तरनिकाय के अनुसार बुद्ध तथा पूर्व-बुद्धकाल में गंधार उत्तरी भारत के सोलह जनपदों में परिगणित था। सिकन्दर केभारत पर आक्रमण के समय गंधार में कई छोटी-छोटी रियासतें थीं, जैसे अभिसार, तक्षशिला आदि। मौर्य साम्राज्यमें संपूर्ण गंधार देश सम्मिलित था। कुषाण साम्राज्य का भी वह एक अंग था। कुषाण काल में ही यहाँ की नई राजधानी पुरुषपुर या पेशावर में बनाई गई। इस काल में तक्षशिला का पूर्व गौरव समाप्त हो गया था। गुप्त काल में गंधार शायद गुप्तों के साम्राज्य के बाहर था क्योंकि उस समय यहाँ यवन, शक आदि बाह्यदेशीयों का आधिपत्य था।

7वीं शती ई. में गंधार के अनेक भागों में बौद्ध धर्म काफ़ी उन्नत था। 8वीं-9वीं शतियों में मुसलमानों के उत्कर्ष के समय धीरे-धीरे यह देश उन्हीं के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया। 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस नेअफ़ग़ानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया लेकिन इसके बाद काफ़ी समय तक यहाँ हिन्दू तथा बौद्ध अनेक क्षेत्रों में रहते रहे। अलप्तगीन और सुबुक्तगीन के हमलों का भी उन्होंने सामना किया। 990 ई. में लमगान (प्राचीन लंपाक) का क़िला उनके हाथों से निकल गया और इसके बाद काफिरिस्तान को छोड़कर सारा अफ़ग़ानिस्तान मुसलमानों के धर्म में दीक्षित हो गया।

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