12/06/2020
पूरी दुनिया में हर साल बाल श्रम को रोकने के लिए 12 जून को एंटी चाइल्ड लेबर डे मनाया जाता है। मगर झारखंड में शायद ही इस दिन के कोई मायने हैं...क्योंकि देश के लगभग हर बड़े शहर में बाल श्रमिकों की एक बड़ी खेप हर साल झारखंड से ही जाती है। यूं तो हर साल औसतन राज्य में 500 बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज होती है, मगर इसमें से आधे कभी मिलते ही नहीं। इससे भी चौंकाने वाली बात ये है कि इससे दोगुने बच्चे हर साल घरों से गायब होते हैं, लेकिन कहीं कोई केस दर्ज नहीं होता। राज्य के पिछड़े जिलों के गरीब परिवारों के बच्चे घर का बोझ उठाने के लिए चुपचाप खुद ही बाल श्रमिक बन जाते हैं। मेट्रो शहरों में घरों में काम करना हो या फैक्ट्रियों में मजदूरी...हर तरह के काम में ये बच्चे लगाए जाते हैं।
मजबूरी की 2 कहानियां...ये किस्सा हर उस घर का है जिसका कोई बच्चा बड़े शहर में मजदूर है
पूरा परिवार खेतों में मजदूरी करता, फिर भी घर नहीं चलता...नौकरी करने नहीं जाती तो क्या करती
गुमला के अहतु गांव की 17 वर्षीय सुमन (बदला हुआ नाम) को मार्च 2020 में पुलिस दिल्ली से रेस्क्यू कर लाई। वहां वह एक घर में कैद थी, दाई का काम लिया जाता था। 2018 में सुमन के जैसी ही एक दर्जन से ज्यादा नाबालिगों को दलालों ने दिल्ली में बेच दिया। घर वालों को कहा गया नौकरी लगा दी है, 15 हजार रुपए एडवांस दे दिए गए थे। उसके बाद ये नाबालिग कभी घर नहीं लौट पाए। सुमन को नौकरी का झांसा देने वाली उसकी ही एक रिश्तेदार मालती थी, जो अब सलाखों के पीछे है। आज सुमन घर लौटकर खुश है, मगर चिंता अब भी घर चलाने की है। कहती है कि पहले पूरा परिवार खेतों में मजदूरी करता था, फिर भी घर चलाना मुश्किल था। ऐसे में नौकरी के लिए जाना ही एकमात्र विकल्प था।
परिवार में आठ बच्चे थे... बड़े पिताजी ने ही मुझे बेच दिया, पढ़ाने का झांसा दे रांची भेजा, नौकरानी बनाया
लोहरदगा के सदर प्रखंड के एक गांव की पुष्पा (बदला हुआ नाम) की उम्र आज 14 वर्ष है...मगर इस उम्र का आधा हिस्सा उसके लिए एक त्रासद याद है। वह बताती है कि गांव में उसके परिवार में बड़े पिताजी के पांच बच्चों के साथ वह तीन भाई-बहन रहते थे। बड़े पिताजी ने ही सौदा कर दिया। 2014 में एक व्यक्ति के साथ रांची भेज कहा कि वह मुझे पढ़ाएगा-लिखाएगा। मगर राजधानी में मुझे एक घर में नौकरानी बना दिया गया। कई बार भागने की कोशिश की, मगर पकड़ी गई। एक दिन मौका पाकर छत से सेप्टिक टैंक के पाइप के सहारे उतरी और भागकर स्टेशन पहुंची। लेकिन मुझे अपने गांव का नाम भी नहीं मालूम था। लोगों ने पुलिस को बताया और उन्होंने मुझे चाइल्ड लाइन पहुंचा दिया। वहां एक साल तक रही। उन्हीं लोगों ने घर तक पहुंचाया।