20/01/2018
आज हरियाणा के यमुनानगर के विवेकानंद स्कूल में पीटीएम में 12वीं के एक छात्र ने स्कूल प्रिंसिपल पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उनकी हत्या कर दी। दो दिन पहले लखनऊ की एक ख़बर देखी थी कि वहां छठी में पढ़ने वाली एक बच्ची ने पहली में पढ़ने वाले एक बच्चे को चाकू मार दिया ताकि स्कूल में छुट्टी हो सके। इस तरह की ख़बरें सिर्फ ख़बरें नहीं हैं, बल्कि ये एक बहुत बड़े ख़तरे का अलार्म हैं, जिसे लेकर हम अभी भी सचेत नहीं हुए तो फिर और खतरनाक नतीजे भुगतने होंगे। हमें सबसे पहले ये समझने की जरूरत है कि आखिर बच्चों में ये हिंसात्मक प्रवृति, ये नकारात्मक बदलाव आ क्यों रहे हैं? मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा कारण है माता, पिता, अभिभावकों का अपने बच्चों पर ध्यान न देना, उनकी अनदेखी करना। बच्चे अपने ही घर में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। स्कूलों में उन्होंने क्या पढ़ा, क्या किया, इस बारे में भी कई लोग अपने बच्चों से बात तक नहीं करते और जब बच्चे सुनाना चाहते भी हैं, तो सुनना नहीं चाहते। बच्चों के आक्रोश को, उनके मन को समझना जरूरी है, वर्ना कभी भी और कोई भी अनहोनी हो सकती है। मैंने पहले भी कहा था और फिर कह रहा हूं कि कई माता-पिता अपने बच्चों को मोबाइल फोन थमा देते हैं, ताकि बच्चे उन्हें परेशान न कर मोबाइल गेम में उलझे रहें। मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जो अपने बच्चों को फोन से खेलते देखकर खुश होते हैं कि देखिए इतना छोटा बच्चा है फिर भी कितनी तेज़ी से फोन पर उंगलियां चला रहा है। आपको मेरी ये बात हास्यास्पद या बनावटी लगेगी, लेकिन ये सच है, मैं खुद ट्रेन में या पब्लिक प्लेस पर अनजानों को भी इसके खतरों से आगाह करता रहा हूं, भले ही उन्हें बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना लगूं। बच्चों को साइक्लिंग, फुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी या पार्कों में दौड़ने-धूपने वाले खेलों की बजाय टीवी पर कार्टून फिल्में देखने देने वाले पैरेंट्स भी अपने देश में कम नहीं हैं। कई पैरेंट्स तो इतने मजबूर या लापरवाह दिखते हैं कि उनके मना करने पर भी बच्चे आराम से सोफे पर जमकर टीवी या मोबाइल में बि़ज़ी होते हैं और उनके पापा-मम्मी जाने दो..के अंदाज में मस्त पड़े रहते हैं। आप खुद तो बदलने को तैयार नहीं है, तो फिर झेलिए बच्चोंं के अपराधी बनने की इन घटनाओं को और इंतजार कीजिए अपने बच्चों की बारी की