24/06/2026
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निकाह को आसान करने के लिए पुरे भारत में मीटिंगें और मस्जिदो में बेठक हो रही है लेकिन तमाम कोशिशें बे नतीजा साबित हो रही है वजह इसकी यह है हमारे निकाह कुरान की हिदायत और कानून के मुताबिक नहीं है
आइए देखते हैं कुरान की हिदायत के मुताबिक कानून क्या कहता है
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कुरान में *निकाह* के लिए जो बुनियादी शर्तें और हिदायतें हैं वो बहुत सादी हैं। सगाई, बारात, जहेज़, वलीमा जैसी रस्में कुरान में नहीं हैं।
*कुरान में निकाह की असल शर्तें:*
*1. ईजाब-ओ-क़ुबूल* - रज़ामंदी
दोनों मर्द-औरत का साफ़-साफ़ कुबूल करना। ज़बरदस्ती का निकाह बातिल है। कुरान 4:19 - _"औरतों को ज़बरदस्ती वारिस न बनाओ"_।
*2. मेहर* - صَدُقَاتِهِنَّ
शौहर पर बीवी का हक़। कुरान 4:4 - _"औरतों को उनके मेहर ख़ुशदिली से दो"_। ये बीवी की मिल्कियत है। मेहर की कोई ख़ास रक़म मुक़र्रर नहीं।
*3. गवाह* - 2 गवाह
कुरान 2:282 में लेन-देन पर गवाह का हुक्म है। निकाह के लिए भी 2 आदिल गवाह ज़रूरी हैं ताकि बाद में इनकार न हो।
*4. एलान* - निकाह को छुपाना नहीं
खुफ़िया निकाह से कुरान रोकता है। 4:25 - समाज को पता होना चाहिए ताकि पाकदामनी साबित हो।
*5. हराम रिश्ते से बचना* - कुरान 4:23-24
माँ, बहन, बेटी, फूफी, ख़ाला, भतीजी-भांजी से निकाह हराम है।
*जो चीज़ें कुरान में नहीं हैं:*
रस्म कुरान में हुक्म
**सगाई/मंगनी** नहीं है
**बारात** नहीं है
**जहेज़** नहीं है - बल्कि मेहर शौहर देगा 4:4
**दहेज़ माँगना** मना - माल नाहक़ खाना 4:29
**वलीमा/खाना खिलाना** निकाह के मामले में कोई हुक्म नहीं है
*खाना खिलाने का हुक्म 22:36 क़ुर्बानी के बारे में है, निकाह के बारे में नहीं।* कुरान ने निकाह के साथ वलीमा या दावत की कोई शर्त नहीं रखी।
*ख़ुलासा:*
कुरान का कानून 3 चीज़ पर खड़ा है: *रज़ामंदी + मेहर + एलान*।
कुरान 2:229 कहता है - _"ये अल्लाह की हदें हैं, उनसे आगे न बढ़ो"_। यानी जो शर्त कुरान ने नहीं लगाई, वो दीन का हिस्सा नहीं।
कुरान निकाह को आसान बनाता है: 24:32 - _"जो बेनिकाह हैं उनका निकाह करा दो... अगर ग़रीब होंगे तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से ग़नी कर देगा"_।
*रस्म-रिवाज का मसला:* कुरान में इन रस्मों का ज़िक्र न होना और निकाह को आसान रखने का हुक्म बताता है कि दिखावे, फ़ुज़ूल-ख़र्ची और बोझ डालने वाली रस्में कुरान की रूह के ख़िलाफ़ हैं। कुरान 7:31 में "इसराफ़ न करो" का आम उसूल भी यही कहता है।
इसलिए जो रस्में निकाह को मुश्किल बनाती हैं, क़र्ज़ में डुबाती हैं या दीन में इज़ाफ़ा करती हैं, वो कुरान की दी हुई हिदायत और आसानी के ख़िलाफ़ पड़ती हैं