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Hamara Manch Kavi Sammelan Event Organizer

18/10/2026

उन्हें तिरंगा लहराने का अधिकार नहीं होगा 🔥 Dr. Hariom Panwar | Kavi Sammelan

17/10/2026

न तो रूस न ही चीन, हरियाणा बजायेगा ट्रम्प की बीन 🤣 Yashdeep Kaushik Yash | Hasya Kavi Sammelan

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद हैहम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद हैबा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़तु...
17/10/2026

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ'तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है

जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है

आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है

बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है

हसरत मोहानी

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखेंशबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखेंआँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होतीतुलता है बशर जिस...
16/10/2026

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें
शबनम कभी शो'ला कभी तूफ़ान हैं आँखें

आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती
तुलता है बशर जिस में वो मीज़ान हैं आँखें

आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को
अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें

लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती
इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें

आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे
दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान! हैं आँखें

साहिर लुधियानवी

तेरी ही तस्वीर में तेरा बदल ढूँडा गयाकितनी आसानी से इक मुश्किल का हल ढूँडा गयातुझ को दुनिया की निगाहों से बचाने के लिएदि...
15/10/2026

तेरी ही तस्वीर में तेरा बदल ढूँडा गया
कितनी आसानी से इक मुश्किल का हल ढूँडा गया

तुझ को दुनिया की निगाहों से बचाने के लिए
दिल के दरिया की तहों में इक महल ढूँडा गया

दिन महीने साल क्या सदियाँ ख़फ़ा होने लगीं
प्यार करने के लिए जब एक पल ढूँडा गया

मैं जो आँखें मूँद कर डूबा हूँ तेरी याद में
डालने के वास्ते कोई ख़लल ढूँडा गया

क्या कहीं पाएँगे हम ऐसी मिसाल-ए-जुस्तुजू
आँख की तश्बीह की ख़ातिर कँवल ढूँडा गया

कुछ बहाना मुझ को सूली पर चढ़ाने के लिए
आज ढूँडेगी ये दुनिया जो न कल ढूँडा गया

पहले काग़ज़ आँसुओं से नम किया 'पर्वाज़' ने
फिर अदा-ए-ख़ास से तुझ को ग़ज़ल ढूँडा गया

विजेंद्र सिंह परवाज़

अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जानादुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जानातुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं द...
14/10/2026

अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना
दुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जाना

तुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं देखें
मोहब्बत के सभी रिश्तों का यूँ नादार हो जाना

अभी तो बे-नियाज़ी में तख़ातुब की सी ख़ुशबू थी
हमें अच्छा लगा था दर्द का दिलदार हो जाना

अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो
हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना

अभी कुछ अन-कहे अल्फ़ाज़ भी हैं कुंज-ए-मिज़्गाँ में
अगर तुम इस तरफ़ आओ सबा-रफ़्तार हो जाना

हवा तो हम-सफ़र ठहरी समझ में किस तरह आए
हवाओं का हमारी राह में दीवार हो जाना

अभी तो सिलसिला अपना ज़मीं से आसमाँ तक था
अभी देखा था रातों का सहर-आसार हो जाना

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

अदा जाफ़री

शोला इधर उधर कभी साया यहीं कहींहोगा वो बर्क़-जिस्म सुबुक-पा यहीं कहींकिन पानियों का ज़ोर उसे काट ले गयादेखा था हम ने एक ...
13/10/2026

शोला इधर उधर कभी साया यहीं कहीं
होगा वो बर्क़-जिस्म सुबुक-पा यहीं कहीं

किन पानियों का ज़ोर उसे काट ले गया
देखा था हम ने एक जज़ीरा यहीं कहीं

मंसूब जिस से हो न सका कोई हादसा
गुम हो के रह गया है वो लम्हा यहीं कहीं

आवारगी का डर न कोई डूबने का ख़ौफ़
सहरा ही आस-पास न दरिया यहीं कहीं

वो चाहता ये होगा कि मैं ही उसे बुलाऊँ
मेरी तरह वो फिरता है तन्हा यहीं कहीं

'बानी' ज़रा सँभल के मोहब्बत का मोड़ काट
इक हादसा भी ताक में होगा यहीं कहीं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैंतारे उफ़ुक़-ए-शे'र पे क्या क्या न जड़े हैंसहरा में है जल-थल तो समुंदर में बगूलेहम ...
12/10/2026

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं
तारे उफ़ुक़-ए-शे'र पे क्या क्या न जड़े हैं

सहरा में है जल-थल तो समुंदर में बगूले
हम वज़्अ के पाबंद हैं चुप-चाप पड़े हैं

आए कोई जाए हमें क्या काम कि हम लोग
खम्बे हैं कि सड़कों के किनारे पे गड़े हैं

ख़ुद पर जो पड़ी है तो धड़कता नहीं दिल भी
ग़ैरों के लिए का'बे में जा जा के लड़े हैं

मेहदी कोई आएगा बदल देगा मुक़द्दर
क्या जानिए इस आस में किस दिन से पड़े हैं

हम कुछ भी हों लेकिन हैं तिरे पाँव की मिट्टी
चर्चे तिरे कुछ भी न हों फिर भी तो बड़े हैं

ये मर्तबा हासिल है तिरी बज़्म को जिन से
वो लोग अभी तक पस-ए-दीवार पड़े हैं

अंगारे बरसते हैं अगर कुछ तो है वर्ना
इस मुँह से सदा फूल मोहब्बत के झड़े हैं

मौक़ूफ़ करो हम-सुख़नी 'मीर' की 'शोहरत'
अरबाब-ए-क़लम पर ये शब-ओ-रोज़ कड़े हैं

शोहरत बुख़ारी

इस राज़ को क्या जानें साहिल के तमाशाईहम डूब के समझे हैं दरिया तिरी गहराईजाग ऐ मिरे हम-साया ख़्वाबों के तसलसुल सेदीवार से...
11/10/2026

इस राज़ को क्या जानें साहिल के तमाशाई
हम डूब के समझे हैं दरिया तिरी गहराई

जाग ऐ मिरे हम-साया ख़्वाबों के तसलसुल से
दीवार से आँगन में अब धूप उतर आई

चलते हुए बादल के साए के तआक़ुब में
ये तिश्ना-लबी मुझ को सहराओं में ले आई

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

क्या सानेहा याद आया 'रज़्मी' की तबाही का
क्यूँ आप की नाज़ुक सी आँखों में नमी आई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं हैरिश्ता ही मिरी प्यास का पानी से नहीं हैकल यूँ था कि ये क़ैद-ए-ज़मानी से थे बेज़ारफ़ुर...
10/10/2026

शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
रिश्ता ही मिरी प्यास का पानी से नहीं है

कल यूँ था कि ये क़ैद-ए-ज़मानी से थे बेज़ार
फ़ुर्सत जिन्हें अब सैर-ए-मकानी से नहीं है

चाहा तो यक़ीं आए न सच्चाई पे उस की
ख़ाइफ़ कोई गुल अहद-ए-खिज़ानी से नहीं है

दोहराता नहीं मैं भी गए लोगों की बातें
इस दौर को निस्बत भी कहानी से नहीं है

कहते हैं मिरे हक़ में सुख़न-फ़हम बस इतना
शेरों में जो ख़ूबी है मुआ'नी से नहीं है

शहरयार

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