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Jai Baba Manimahesh
04/06/2026

Jai Baba Manimahesh

 # #स्वयं को  #सिद्ध करना है, तो स्वयं से  #जिद्द  भी करनी होगी…**इसीलिए  #हठयोग** का महत्व इतना गहरा है।यह बाहर की जिद ...
25/05/2026

# #स्वयं को #सिद्ध करना है, तो स्वयं से #जिद्द भी करनी होगी…**

इसीलिए #हठयोग** का महत्व इतना गहरा है।
यह बाहर की जिद नहीं — भीतर की जिद है।
यह किसी को हराने की नहीं — स्वयं को साधने की यात्रा है।
यह अनंत की ओर चलने का साहस है।

धैर्य, अनुशासन, संयम और गुरु-निष्ठा के बिना कोई भी साधना फलित नहीं होती।

📿 **अक्सर साधक पूछते हैं —**
“मैंने इतना जाप किया…”
“मैंने इतनी साधना की…”
“मैंने इतने अनुष्ठान किए…”

**फिर भी फल क्यों नहीं मिला?**

पर एक प्रश्न स्वयं से भी पूछना चाहिए—

**क्या मैंने फल को धारण करने की पात्रता भी बनाई है?**

क्योंकि इच्छा होना और पात्र होना — दोनों अलग बातें हैं।

बीज बो देने से फसल नहीं आती।
भूमि तैयार करनी पड़ती है।
उसे उपजाऊ बनाना पड़ता है।
फिर बीज, फिर पोषण, फिर रक्षा…
तब जाकर समय आने पर फल प्राप्त होता है।

#साधना भी ऐसी ही है।

आज अधिकांश लोग परिणाम चाहते हैं…
पर परिणाम को जन्म देने वाली प्रक्रिया को नहीं।

सब कुछ तुरंत चाहिए।
जल्दी सिद्धि चाहिए।
जल्दी अनुभव चाहिए।

और जब अपेक्षा पूरी न हो—

#मंत्र बदल दो…
#इष्ट बदल दो…
#गुरु बदल दो…

यहीं सबसे बड़ी अधीरता प्रारम्भ होती है।

#साधना का प्रारम्भ कहाँ से होता है?

सर्वप्रथम — **स्वयं से।**
#शरीर से।
#योग से।
#आहार से।
#बैठने की क्षमता से।
#मन को देखने की क्षमता से।

धीरे-धीरे साधक अपने भीतर स्थान बनाता है।
क्योंकि यदि भीतर स्थान नहीं बना —
तो बाहरी संसार मन और बुद्धि पर अधिकार कर लेता है।

# # # 📿 मंत्र बदलने से पहले…
मंत्र बदलने से पहले **मन देखिए।**
इष्ट बदलने से पहले **दिशा देखिए।**
गुरु बदलने से पहले **अपनी ग्रहण करने की क्षमता देखिए।**

क्योंकि—

**गुरु केवल शरीर नहीं होते।**
गुरु एक #तत्व हैं।
एक चेतना हैं।
एक दिशा हैं — जो शरीर से प्रकट होती है, पर शरीर तक सीमित नहीं होती।

# #मंत्र कब जागता है?
शायद मंत्र नहीं जागता…

**धीरे-धीरे साधक जागने लगता है।**
जब प्रतिक्रिया कम होने लगे…
जब भीतर स्थिरता आने लगे…
जब दिखावे से अधिक सत्य प्रिय लगने लगे…
जब जीवन में सजगता आने लगे…

तो समझिए — साधना भीतर कार्य कर रही है।

# #मंत्र सिद्धि क्या है?
केवल संख्या पूरी कर लेना नहीं।

बल्कि वह अवस्था—
जहाँ मंत्र आपके विचार, वाणी और जीवन में उतरने लगे।

# #इष्ट सिद्धि क्या है?
जब इष्ट केवल पूजाघर में न रहें—
बल्कि उनके गुण जीवन में उतरने लगें।

शिव — तो स्थिरता।
भैरव — तो निर्भयता।
शक्ति — तो जागृति।

तंत्र और साधना के मार्ग में एक बात विशेष कही गई है—
#शक्ति की उपासना केवल जिज्ञासा नहीं, पात्रता भी मांगती है।**
और पारंपरिक दृष्टि से तांत्रिक साधना सदैव गुरु के मार्गदर्शन, अनुशासन और मर्यादा में समझी जाती है।

#अंत में एक बात याद रखिए—
*सिद्धि का कोई छोटा मार्ग नहीं होता।*

एक मंत्र।
एक दिशा।
एक निष्ठा।
और इतना धैर्य — कि परिणाम आने से पहले भी साधना न छूटे।

जैसे शरीर को भोजन चाहिए,
वैसे आत्म-विकास के लिए साधना।

और साधना का सबसे बड़ा प्रमाण अनुभव नहीं—
# # *बल्कि आपका बदला हुआ जीवन है।**
**विचार बदले।
व्यवहार बदला।
वाणी बदली।
इच्छाएँ शुद्ध हुईं।
जीवन अधिक सजग हुआ।**
वहीं से वास्तविक साधना प्रारम्भ होती है।

आप देखेंगे आपके जीवन में जिसे आप कष्ट समझते थे, वोह अब कष्ट नहीं अपितु एक लघु अनुभव प्रतीत होगा, आपके ईष्ट आपकी क्षमता और सक्षमता को इतना बड़ा का देगें कि बड़ा कष्ट भी लघु सा प्रतीत होगा , सम्पन्नता, कीर्ति, समृद्धि, यश ,सौभाग्य का उदय होगा। बस साधना को पकड़ लो, बाकी सब साधन इष्ट जुटा देगा।

हर एक साधक को शुभ प्रातः उठ कर सर्व प्रथम

#सूर्य देव को प्रणाम।
#कुल वृक्ष को प्रणाम ।
#माता पिता को प्रणाम।
#गुरु ,परम गुरु,परात्पर गुरु और परमेष्ठि गुरु को प्रणाम जरूर करें। यह सब हमारी सुरक्षा और सहायता करते है। इसका चमत्कार आप स्वयं अनुभव करेंगे।

भगवती सब का कल्याण करे।
जय श्री महाकाल । जय मां परमेश्वरी।
#जय कुलेश्वर।
कौल साधक भगेश्ववरानन्द नाथ।

**तीन लोक है देह में — इसका क्या अर्थ है?**संतमत और योग परंपराओं में मानव शरीर को केवल मांस और हड्डियों का ढाँचा नहीं मा...
24/05/2026

**तीन लोक है देह में — इसका क्या अर्थ है?**

संतमत और योग परंपराओं में मानव शरीर को केवल मांस और हड्डियों का ढाँचा नहीं माना गया, बल्कि इसे एक सूक्ष्म जगत कहा गया है।
इसीलिए कहा गया —

“तीन लोक है देह मे । रोम रोम मे धाम ।
बिन सतगुरु नहीं पाइए । सार शब्द निज नाम ।”

इस शरीर के भीतर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना जैसी नाड़ियों का वर्णन मिलता है।
योग मार्ग में इन्हें ऊर्जा और चेतना के प्रवाह का माध्यम माना जाता है।

🔹 **इंगला (इड़ा)**
यह मन के शांत, कल्पनात्मक और भावनात्मक पक्ष से जुड़ी मानी जाती है।

🔹 **पिंगला**
यह सक्रियता, इच्छा और बाहरी क्रिया से जुड़ी मानी जाती है।

🔹 **सुषुम्ना**
इसे दोनों के बीच की मुख्य धारा कहा गया है, जहाँ साधक चेतना को ऊपर ले जाने का प्रयास करता है।

इसी प्रकार इस चित्र में “शिव” को चेतन साक्षी नहीं, बल्कि “मन” के प्रतीक रूप में समझा जा सकता है —
जो देखता, सोचता और अनुभव करता है।

और “शक्ति” को “माया” के रूप में —
जो दृश्य, अनुभव, रूप और संसार की रचना करती है।

यानी यह पूरा खेल मन, माया और चेतना के आपसी संबंध का है।
जहाँ मन विचार उत्पन्न करता है, माया उन्हें दृश्य और अनुभव का रूप देती है, और चेतना उनमें उलझ जाती है।

लेकिन संत यहाँ एक बहुत गहरी बात कहते हैं —
यह सब अभी भी शरीर और सूक्ष्म अनुभवों के क्षेत्र के भीतर है।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं कि चेतना मन और माया से कैसे जुड़ी।
बल्कि यह है कि चेतना अपनी मूल चेतना से कैसे मिले?

और संतों के अनुसार वह मिलन शरीर के भीतर नहीं,
बल्कि शरीर, मन, माया और दृश्य से परे बताया गया है।

यानी जहाँ न इंगला है,
न पिंगला,
न सुषुम्ना,
न मन,
न माया —
वहीं वास्तविक चेतन मिलन की बात कही गई है।

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वीरवार की सुबह दिव्य स्वरूप के दर्शन कीजिए नरसिंह मंदिर भरमौर चम्बा के की  व भगवान नरसिंह जन्मोत्सव की हार्दिक बधाई ऊं न...
30/04/2026

वीरवार की सुबह दिव्य स्वरूप के दर्शन कीजिए नरसिंह मंदिर भरमौर चम्बा के की व भगवान नरसिंह जन्मोत्सव की हार्दिक बधाई ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः

गुरु बिना साधना कैसे – गुरु दत्तात्रेय का स्वयंभू गुरु तत्वमित्रो, आज के समय में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिसके जीवन म...
29/04/2026

गुरु बिना साधना कैसे – गुरु दत्तात्रेय का स्वयंभू गुरु तत्व

मित्रो, आज के समय में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिसके जीवन में कोई बाहरी गुरु नहीं है, वह साधना कैसे करे? क्या गुरु के बिना मार्ग नहीं है? शास्त्र इसी प्रश्न का उत्तर गुरु दत्तात्रेय के रूप में देते हैं।

गुरु दत्तात्रेय कौन हैं – ब्रह्मा-विष्णु-महेश का संयुक्त स्वरूप

गुरु दत्तात्रेय को आदि गुरु कहा गया है। वे ऐसे गुरु हैं जो किसी एक संप्रदाय, जाति या दीक्षा से बंधे नहीं हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों के तत्व जिनमें समाहित हैं, वही दत्तात्रेय हैं। यही कारण है कि वे सृष्टि के सबसे प्राचीन गुरु माने जाते हैं – गुरु से भी पहले के गुरु। उन्हें स्वयंभू गुरु तत्व कहा जाता है, क्योंकि वे स्वयं में ही गुरु हैं, किसी दीक्षा या संप्रदाय के अधीन नहीं।

24 गुरु प्रकृति से – एक भी मानव गुरु नहीं

गुरु दत्तात्रेय का जीवन अपने आप में एक बड़ा संदेश है। उन्होंने एक भी मानव गुरु नहीं बनाया। बल्कि उन्होंने 24 गुरु प्रकृति से ग्रहण किए – पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल, आकाश, सूर्य, चंद्र, मकड़ी, मधुमक्खी, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, हाथी, भौंरा, हिरण, मछली, पिंगला (वेश्या), कुररी (पक्षी), बालक, कुम्हार, सांप, और अर्जुन (बाण)। इन सबसे उन्होंने गुरुता ग्रहण की। इसका अर्थ साफ है – जहाँ सीखने की दृष्टि है, वहीं गुरु है। तुम्हें किसी मानव गुरु की आवश्यकता नहीं, यदि तुम देखना सीख जाओ। हर वस्तु, हर प्राणी, हर घटना तुम्हारी गुरु हो सकती है। और जिसके पास यह दृष्टि है, उसके लिए गुरु दत्तात्रेय स्वयं साथ हैं।

नाथ परंपरा और 84 सिद्धों की जड़ गुरु दत्तात्रेय

नाथ परंपरा में गुरु दत्तात्रेय का स्थान अत्यंत ऊँचा है। नवनाथ परंपरा की जड़ गुरु दत्तात्रेय माने जाते हैं। मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ और 84 सिद्धों की साधना-रेखा सीधे दत्तात्रेय से जुड़ती है। यही कारण है कि नाथ योग में आज भी कहा जाता है – गुरु बिना मार्ग नहीं, और गुरु दत्त बिना नाथ नहीं। गोरखनाथ जैसे सिद्ध साधकों ने भी गुरु दत्तात्रेय से ही प्रेरणा और शक्ति ग्रहण की थी।

गुरु दत्तात्रेय की शक्ति – गुरु-विहीन को गुरु देने वाले

गुरु दत्तात्रेय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे गुरु-विहीन को गुरु देते हैं। भटके हुए साधक को दिशा देते हैं। मानसिक उलझन, भय, पितृ बाधा, ग्रह बाधा, दारिद्र्य – इन सबमें सहारा बनते हैं। और सबसे बड़ी बात – वे साधक के भीतर गुरु तत्व जागृत कर देते हैं। तब साधक को बाहर किसी गुरु की खोज नहीं करनी पड़ती – उसके भीतर ही मार्गदर्शक जाग जाता है। इसीलिए उन्हें स्मरण मात्र से संतुष्ट होने वाले गुरु कहा गया है। तुम्हारी स्मरण शक्ति ही तुम्हारी साधना है।

बिना दीक्षा, बिना वस्त्र, बिना दिखावा – बस श्रद्धा चाहिए

जिनके जीवन में कोई बाहरी गुरु नहीं है, वे गुरु दत्तात्रेय को गुरु रूप में स्वीकार कर सकते हैं। इसके लिए कोई दीक्षा, कोई विशेष वस्त्र, कोई दिखावा आवश्यक नहीं। बस श्रद्धा और स्थिरता चाहिए। एक बार उन्हें गुरु मान लिया, तो वे अपने आप राह दिखाने लगते हैं। कई साधक पूछते हैं – क्या गुरु दत्तात्रेय सच में साथ देते हैं? नाथ परंपरा और दत्त संप्रदाय में यह अनुभव सामान्य है कि संकट, यात्रा, भय या निर्णय के समय अचानक भीतर से मार्ग खुलने लगता है। कोई आवाज नहीं, कोई दर्शन नहीं – बस अंदर से सब साफ होने लगता है, निर्णय सही आने लगते हैं, रास्ते अपने आप खुल जाते हैं। यही गुरु कृपा का पहला संकेत होता है।

गुरु दत्तात्रेय का माला मंत्र – सबसे सरल और प्रभावी साधन

गुरु दत्त की साधना में सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है – गुरु दत्तात्रेय का माला मंत्र। यह कोई साधारण मंत्र नहीं है। यह माला मंत्र साधक को धीरे-धीरे गुरु मंडल से जोड़ता है। जप करते-करते एक दिन साधक को अनुभव होने लगता है – उसके भीतर एक सुरक्षा बंध गई है, एक स्थिरता आ गई है, एक मार्गदर्शन बन गया है।

यह वही मंत्र है जो नाथ परंपरा में गुरु-शिष्य परंपरा से चला आ रहा है। यह कोई पुस्तकीय मंत्र नहीं – यह अनुभूत मंत्र है, सिद्ध मंत्र है, जिसे साधकों ने परीक्षा में देखा है।

माला मंत्र का पाठ

ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय, स्मरणमात्रसन्तुष्टाय
महाभयनिवारणाय महाज्ञानप्रदाय, चिदानन्दात्मने
बालोन्मत्तपिशाचवेषाय, महायोगिने, अवधूताय, अनघाय
अनसूयानन्दवर्धनाय अत्रिपुत्राय, सर्वकामफलप्रदाय
ॐ भवबन्धविमोचनाय, आं असाध्यसाधनाय
ह्रीं सर्वविभूतिदाय, क्रौं असाध्याकर्षणाय
ऐं वाक्प्रदाय, क्लीं जगत्रयवशीकरणाय
सौः सर्वमनःक्षोभणाय, श्रीं महासम्पत्प्रदाय
ग्लौं भूमंडलाधिपत्यप्रदाय, द्रां चिरंजीविने
वषट्वशीकुरु वशीकुरु, वौषट् आकर्षय आकर्षय
हुं विद्वेषय विद्वेषय, फट् उच्चाटय उच्चाटय
ठः ठः स्तंभय स्तंभय, खें खें मारय मारय
नमः सम्पन्नय सम्पन्नय, स्वाहा पोषय पोषय
परमन्त्रपरयन्त्रपरतन्त्राणि छिंधि छिंधि
ग्रहान्निवारय निवारय, व्याधीन् विनाशय विनाशय
दुःखं हर हर, दारिद्र्यं विद्रावय विद्रावय
देहं पोषय पोषय, चित्तं तोषय तोषय
सर्वमन्त्रस्वरूपाय, सर्वयन्त्रस्वरूपाय
सर्वतन्त्रस्वरूपाय, सर्वपल्लवस्वरूपाय
ॐ नमो महासिद्धाय स्वाहा

एक प्रयोग – सात दिन का माला अभ्यास

सुबह स्नान के बाद किसी शुद्ध स्थान पर बैठें। रीढ़ सीधी रखें। ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय... से शुरू होने वाले इस माला मंत्र का एक माला (11 बार) जप करें। ऐसे नित्य अपनी साधना में शामिल कर लीजिये

एक लाइन में सार: “गुरु दत्तात्रेय स्वयंभू गुरु हैं – जिसे कोई नहीं मिला, उसे वे अपना लेते हैं। बस उन्हें याद करो, बस उन्हें मान लो।”

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19/04/2026

जय हो केलंग वजीर ⚜️🦚🙏शक्ति और साहस के देव निराले, कार्तिकेय स्वामी हैं जग के रखवाले। जिनके चरणों में झुकता सारा संसार, उन देवसेनापति को हमारा बारम्बार प्रणाम।

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19/04/2026

14 april 2026 को केलंग वजीर कुगती में कार्तिक स्वामी के कपाट खोल दिए गए है । मन्दिर में रखा हुआ कलश भरा हुआ निकला इस बार अच्छा मानसून होगा और अच्छी फसल होगी।जय केलंग बजीर । जय कार्तिक स्वामी। जय शिव कैलाश वासी की जय।

वन के शांत, पवित्र वातावरण में अग्नि की मंद लपटें जल रही थीं। उस दिव्य दृश्य में स्वयं महादेव और माता अन्नपूर्णा मानव जी...
18/04/2026

वन के शांत, पवित्र वातावरण में अग्नि की मंद लपटें जल रही थीं। उस दिव्य दृश्य में स्वयं महादेव और माता अन्नपूर्णा मानव जीवन के एक अत्यंत सरल, अपितु गहन रहस्य को प्रकट कर रहे थे।

कथा कहती है कि एक बार भगवान शिव ने जगत को यह उपदेश दिया कि यह संसार मात्र माया है, यहाँ तक कि अन्न भी माया है। जब यह बात माता पार्वती ने सुनी, तो उन्होंने सोचा—यदि अन्न ही माया है, तो जीवों का पालन कैसे होगा? तब माता ने अन्न की शक्ति को जगत से अदृश्य कर दिया। परिणाम यह हुआ कि समस्त सृष्टि में हाहाकार मच गया, कोई अन्न नहीं रहा, भूख ने देवताओं और मनुष्यों को व्याकुल कर दिया।

तब स्वयं महादेव को अपनी बात का वास्तविक अर्थ समझ में आया। वे काशी नगरी में भिक्षुक बनकर पहुँचे, जहाँ माता पार्वती अन्नपूर्णा रूप में प्रकट हुईं। उस दिन माता ने स्वयं अपने हाथों से भगवान शिव को अन्न परोसा। यह वही क्षण था जब शिव ने स्वीकार किया कि अन्न केवल शरीर का पोषण नहीं, अपितु यह साक्षात् देवी शक्ति का प्रसाद है।

यह चित्र उसी दिव्य लीला का प्रतीक है—जहाँ शिव, जो स्वयं विश्व के संहारक हैं, अन्न के महत्व को समझते हुए विनम्र भाव से उपस्थित हैं, और माता अन्नपूर्णा सृष्टि के पोषण की अधिष्ठात्री बनकर प्रेमपूर्वक भोजन बना रही हैं। अग्नि पर चढ़े पात्र, साधारण वन का परिवेश, और देवी-देवताओं का यह सहज रूप हमें यह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी साधना भी अंततः अन्न और करुणा से ही पूर्ण होती है।

अन्न केवल भोजन नहीं, अपितु जीवन का आधार है। जिस घर में अन्न का सम्मान होता है, वहाँ लक्ष्मी और शांति का निवास होता है। और जहाँ अन्न का तिरस्कार होता है, वहाँ अभाव अपने आप आ जाता है।

॥ स्तोत्र ॥
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥

माता अन्नपूर्णा हमें केवल अन्न ही नहीं देतीं, अपितु ज्ञान, संतोष और समृद्धि का आशीर्वाद भी प्रदान करती हैं। इस दिव्य कथा का स्मरण हमें यह सिखाता है कि हर अन्न का कण ईश्वर का प्रसाद है—उसे श्रद्धा, कृतज्ञता और प्रेम से ग्रहण करना ही सच्ची भक्ति है।

नमामीशमीशान

भरमौर के कुगती अभयारण्य में दिखा दुर्लभ सफेद हिमालयन थार 'करथ'
03/04/2026

भरमौर के कुगती अभयारण्य में दिखा दुर्लभ सफेद हिमालयन थार 'करथ'

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