09/02/2026
🌹शिव तांडव स्तोत्र का महत्व🌹;-
1-भगवान शिव की आराधना व उपासना के लिए रचे गए सभी अन्य स्तोत्रों में रावण रचित या रावण द्वारा गया गया शिवतांडव स्तोत्र भगवान शिव को अत्यधिक प्रिय है, ऐसी हिन्दू धर्म की मान्यता है और माना जाता है कि शिवतांडव स्तोत्र द्वारा भगवान शिव की स्तुति करने से व्यक्ति को कभी भी धन-सम्पति की कमी नहीं होती, साथ ही व्यक्ति को उत्कृष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है।यानी व्यक्ति का चेहरा तेजस्वी बनता है तथा उसके आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है।
2-इस शिवतांडव स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से व्यक्ति को जिस किसी भी सिद्धि की महत्वकांक्षा होती है, भगवान शिव की कृपा से वह आसानी से पूर्ण हो जाती है। साथ ही ऐसा भी माना जाता है कि इस स्तोत्र के नियमित पाठ से वाणी सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। यानी व्यक्ति जो भी कहता है, वह वैसा ही घटित होने लगता है। नृत्य, चित्रकला, लेखन, योग, ध्यान, समाधी आदि सिद्धियां भगवान शिव से ही सम्बंधित हैं, इसलिए शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करने वाले को इन विषयों से सम्बंधित सफलता सहज ही प्राप्त होने लगती हैं।
3-इतना ही नहीं, शनि को काल माना जाता है जबकि शिव महाकाल हैं, अत: शनि से पीड़ित व्यक्ति को इसके पाठ से बहुत लाभ प्राप्त है। साथ ही जिन लोगों की जन्म-कुण्डली में सर्प योग, कालसर्प योग या पितृ दोष होता है, उन लोगों के लिए भी शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करना काफी उपयोगी होता है क्योंकि हिन्दू धर्म में भगवान शिव को ही आयु, मृत्यु और सर्प का स्वामी माना गया है।जब कभी स्वास्थ्य की समस्याओं का कोई तत्काल समाधान न निकल पा रहा तो ऐसे में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभदायक होता है। व्यक्ति को जब कभी भी ऐसा लगे कि किसी प्रकार की तंत्र, मंत्र और शत्रु परेशान कर रहा है तो ऐसे में शिव तांडव का पाठ करना अत्यंत लाभदायक होता है।
शिव तांडव स्तोत्र के लाभ;-
1-जब कभी स्वास्थ्य की समस्याओं का कोई तत्काल समाधान न निकल पा रहा तो ऐसे में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभदायक होता है। व्यक्ति को जब कभी भी ऐसा लगे कि किसी प्रकार की तंत्र, मंत्र और शत्रु परेशान कर रहा है तो ऐसे में शिव तांडव का पाठ करना अत्यंत लाभदायक होता है।
2-शिव तांडव स्तोत्र का लाभ रावन ने भगवान शिव को प्रसन्न करके लिया था। शिव तांडव स्तोत्र भोलेनाथ के परम भक्त विद्वान् रावण द्वारा रचित एक स्तोत्र है। यह स्तुति पंचचामर छंद में है। मान्यता है कि रावण जब कैलाश लेकर चलने लगे तो शिव जी ने अंगूठे से कैलाश को दबा दिया। परिणामस्वरूप कैलाश वहीं रह गया और रावण दब गया। फिर रावण ने शिव की स्तुति की तब जाकर शिव प्रसन्न हुए। रावण द्वारा की गई यह स्तुति ही शिव तांडव के रूप में जाना जाता है।
3-शास्त्रों के अनुसार, सभी शिव की पूजा कर सकते हैं। कोई नियम नहीं है, किसी भी जाति या लिंग का कोई भी व्यक्ति कभी भी शिव तांडव स्तोत्रम का जाप कर सकता है। सिद्धि प्राप्ति के लिए शिव तांडव स्त्रोत एकमात्र योग्यता भक्ति है। शिव तांडव स्तोत्रम का पाठ आपको शक्ति, मानसिक शक्ति, सुख, समृद्धि और बहुत कुछ देता है। इन सभी से अधिक, आपको निश्चित रूप से शिव का आशीर्वाद प्राप्त होगा।
4-यदि आप पूरी निष्ठा के साथ गीत को सुनते हैं, तो आप निश्चित रूप से शंभू की उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। शिव तांडव स्त्रोत सबसे ऊर्जावान और शक्तिशाली रचना है जिसे पूरी श्रृष्टि नमन करती है। शिव तांडव स्त्रोत का नियमित पाठ करने से स्वस्थ्य संबंधित रोग दूर होते हैं। शिव तांडव स्त्रोत का पाठ यदि रात्रि में किया जाए तो शत्रु पर प्राप्त होती है, लेकिन ध्यान रहे पाठ करने से पहले मन में किसी के प्रति बुरा विचार ना लाएं। शिव तांडव स्त्रोत को सुबह भजन के रूप में पाठ करने से आपको अपने पापों से मुक्ति मिलती है। शिव से अपनी गलतियों की क्षमा मांगते समय मन को कोमल रखें।
शिव तांडव स्तोत्रं ;-
शिव की स्तुति के लिए रचा गया वह सामवेद का वह स्त्रोत, जिसे रावण ने गाया था, को आज भी रावण-स्त्रोत व शिव तांडव स्त्रोत के नाम से जाना जाता है, जो कि निम्नानुसार है-
जटा-टवी–गलज्ज -जल–प्रवाह–पावित–स्थले
गलेऽव–लम्ब्य–लम्बितां–भुजङ्ग–तुङ्ग–मालिकाम्
डमड्ड-डमड्ड-डमड्ड-डमड्ड–निनाद-वड्ड-डमर्वयं
चकार–चण्ड्-ताण्डवं–तनोतु–नः शिवः शिवम् .. 1..
जटा–कटाह-संभ्रम-भ्रमन्नि–निलिम्प–निर्झरी-
विलोल-वीचि-वल्लरी–विराजमान–मूर्धनि .
धगद्ध-धगद्ध-धगद्ध–ज्ज्वलल–ल्ललाट–पट्ट–पावके
किशोर-चन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. 2..
धरा–धरेन्द्र–नंदिनी-विलास–बन्धु–बन्धुर
स्फुरद–दिगन्त–सन्तति-प्रमोद–मान–मानसे .
कृपा–कटाक्ष–धोरणी–निरुद्ध–दुर्धरा-पदि
कव्चिद–द्दिगम्बरे–मनो विनोद-मेतु वस्तुनि .. 3..
जटा–भुजङ्ग–पिङ्गल–स्फुरत- फणा–मणिप्रभा
कदम्ब–कुङ्कुम–द्रव-प्रलिप्त–दिग्वधू-मुखे
मदान्ध–सिन्धुर–स्फुरत्त्व–गुत्तरी–यमे–दुरे
मनो विनोद-मद्भुतं–बिभर्तु–भूतभर्तरि .. 4..
सहस्र-लोचन-प्रभृत्य–शेष–लेख–शेखर
प्रसून–धूलि–धोरणी–विधू–सराङ्घ्रि–पीठभूः
भुजङ्ग-राज–मालया–निबद्ध–जाटजूटक:
श्रियै–चिराय–जायतां चकोर–बन्धु–शेखरः .. 5..
ललाट–चत्वर–ज्वलद्ध-धनञ्जय–स्फुलिङ्गभा-
निपीत–पञ्च–सायकं–नमन्नि–लिम्प–नायकम्
सुधा–मयूख–लेखया–विराजमान–शेखरं
महाकपालि–सम्पदे–शिरो–जटाल–मस्तुनः.. 6..
कराल–भाल–पट्टिका–धगद्ध-धगद्ध-धगज–ज्ज्वलद्ध
धनञ्जया-हुती-कृत–प्रचण्ड-पञ्च–सायके
धरा–धरेन्द्र–नन्दिनी–कुचाग्र-चित्र–पत्रक
–प्रकल्प–नैक-शिल्पिनि–त्रिलोचने–रतिर्मम … 7..
नवीन–मेघ–मण्डली–निरुद्ध–दुर्धर–स्फुरत्
कुहू–निशीथिनी–तमः प्रबन्ध–बद्ध–कन्धरः
निलिम्प–निर्झरी–धरस्–तनोतु कृत्ति–सिन्धुरः
कला–निधान–बन्धुरः श्रियं जगद्ध-धुरंधरः .. 8..
प्रफुल्ल–नीलपङ्कज–प्रपञ्च–कालिमप्रभा-
–वलम्बि–कण्ठ–कन्दली–रुचिप्रबद्ध–कन्धरम् .
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छि-दांध-कछिदं तमंत-कच्छिदं भजे .. 9..
अखर्व-सर्व–मङ्गला-कला–कदंबमञ्जरी
रस–प्रवाह–माधुरी विजृंभणा–मधुव्रतम् .
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त–कान्ध–कान्तकं तमन्त-कान्तकं भजे .. 10..
जयत्व–वदभ्र–विभ्रम–भ्रमद्भ--भुजङ्ग–मश्वस-
द्विनिर्गमत-क्रम –स्फुरत- कराल–भाल–हव्य-वाट्
धिमिद्धि-धिमिद्धि-धिमिद्धि-ध्वनम-मृदङ्ग–तुङ्ग–मङ्गल
ध्वनि–क्रम–प्रवर्तित प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः .. 11..
दृषद्वि-चित्र–तल्पयो-र्भुजङ्ग–मौक्ति–कस्रजोर्
गरिष्ठ-रत्न-लोष्ठयोः सुहृद्वि–विपक्ष-पक्षयोः .
तृष्णार–विन्द–चक्षुषोः प्रजा–मही–महेन्द्रयोः
सम-प्रवृति-कः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् .. 12..
कदा निलिम्प–निर्झरी-निकुञ्ज–कोटरे वसन्
विमुक्त–दुर्मतिः सदा शिरःस्थ–मञ्जलिं वहन् .
विलोल–लोल–लोचनो ललाम–भाल-लग्नकः
शिवेति मंत्र–मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. 13..
निलिम्प नाथ-नागरी कदम्ब मौल-मल्लिका-
निगुम्फ-निर्भक्ष-रन्म धूष्णिका-मनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं-महनिशं
परिश्रय परं पदं तदंग-जत्विषां चयः ॥ 14॥
प्रचण्ड वाडवा-नल प्रभा-शुभ-प्रचारणी
महाअष्ट-सिद्धि-कामिनी जना-अवहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाह-कालिक-ध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्ज-जगयाय जायताम् ॥ 15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्त-मुक्त-मोत्तमं स्तवं
पठन-स्मरन- ब्रुवन्नरो- विशुद्धि–मेति–संततम् .
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु-याति-नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. 16..
पूजा-वसान-समये दश-वक्त्र-गीतं
यः शंभु-पूजन-परं -पठति -प्रदोषे .
तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां
लक्ष्मीं सदैव-सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. 17..
॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्॥
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शिव तांडव स्तोत्रं का अर्थ
1-सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएँ लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें। >>>1
2-अति अम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं तथा जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ धधक कर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल चंद्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिवजी में मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे। >>>2
3-पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम आनंदित चित्त वाले (माहेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, ऐसे (दिशा ही हैं वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा।>>>3
4-जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान पीले प्रभा-समूह रूप केसर कांति से दिशा बंधुओं के मुखमंडल को चमकाने वाले, मतवाले, गजासुर के चर्मरूप उपरने से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा मन विनोद को प्राप्त हो।>>>4
5-इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें।>>>5
6-इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें।>>>6
7-जिनके तीन नेत्र हैं,उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्…की घ्वनि से जलती है,जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला से प्रचंड कामदेव को भस्म करने वाले तथा एकमात्र कलाकार जो पर्वत राजसुता के स्तन के अग्रभाग पर विविध भांति की चित्रकारी करने में अति चतुर त्रिलोचन हैं,में मेरी प्रीति अटल हो।>>>7
8-नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि के घने अंधकार की तरह अति गूढ़ कंठ वाले, देव नदी गंगा को धारण करने वाले, जगचर्म से सुशोभित, बालचंद्र की कलाओं के बोझ से विनम्र , जगत के बोझ को धारण करने वाले शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्ति दें। >>>8
9-फूले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्याम प्रभा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कंधे वाले, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों के काटने वाले, दक्षयज्ञ विध्वंसक, गजासुरहंता, अंधकारसुर नाशक और मृत्यु के नष्ट करने वाले श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ। >>>9
10-कल्याणमय, नाश न होने वाली समस्त कलाओं की कलियों से बहते हुए रस की मधुरता का आस्वादन करने में भ्रमररूप, कामदेव को भस्म करने वाले, त्रिपुरासुर, विनाशक, संसार दुःखहारी, दक्षयज्ञ विध्वंसक, गजासुर तथा अंधकासुर को मारनेवाले और यमराज के भी यमराज श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ।>>>10
11-अत्यंत शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से क्रमशः ललाट में बढ़ी हुई प्रचंड अग्नि वाले मृदंग की धिम-धिम मंगलकारी उधा ध्वनि के क्रमारोह से चंड तांडव नृत्य में लीन होने वाले शिवजी सब भाँति से सुशोभित हो रहे हैं। >>>11
12-कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शय्या में सर्प और मोतियों की मालाओं में मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में, शत्रु और मित्र में, तिनके और कमल लोचननियों में, प्रजा और महाराजाधिक राजाओं के समान दृष्टि रखते हुए कब मैं शिवजी का भजन करूँगा। >>>12
13-कब मैं श्री गंगाजी के कछारकुंज में निवास करता हुआ, निष्कपटी होकर सिर पर अंजलि धारण किए हुए चंचल नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुंदरी पार्वतीजी के मस्तक में अंकित शिव मंत्र उच्चारण करते हुए परम सुख को प्राप्त करूँगा।>>>13
14-देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें।>>>14
15-प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ।>>>15
16-इस परम उत्तम शिवतांडव श्लोक को नित्य प्रति मुक्तकंठ से पढ़ने से या श्रवण करने से संतति वगैरह से पूर्ण हरि और गुरु में भक्ति बनी रहती है। जिसकी दूसरी गति नहीं होती शिव की ही शरण में रहता है।>>>16
17-शिव पूजा के अंत में इस रावणकृत शिव तांडव स्तोत्र का प्रदोष समय में गान करने से या पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।रथ गज-घोड़े से सर्वदा युक्त रहता है।>>>17
श्री रावणकृतम् शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्॥
तत्काल फल देने वाले 5 मंत्र ;-
भगवन वीरभद्र साधना;-
''My salutations to those who are not terrible, to those who are terrible, and to those who are both terrible and not terrible.
Everywhere and always I bow to all Rudra forms.''
1-वीरभद्र, भगवान शिव के परम आज्ञाकारी हैं। उनका रूप भयंकर है, देखने में वे प्रलयाग्नि के समान, हजार भुजाओं से युक्त और मेघ के समान श्यामवर्ण हैं। सूर्य के तीन जलते हुए बड़े-बड़े नेत्र एवं विकराल दाढ़ें हैं। शिव ने उन्हें अपनी जटा से प्रकट किया था। इसलिए उनकी जटाएं साक्षात ज्वालामुखी के लावा के समान हैं। गले में नरमुंड माला वाले वीरभद्र सभी अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं। उनका रूप भले ही भयंकर है पर शिवस्वरूप होने के कारण वे परम कल्याणकारी हैं ,शीघ्र प्रसन्न होने वाले है।
2-वीरभद्र उपासना तंत्र में वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र आता है। यह एक स्वयं सिद्ध चमत्कारिक तथा तत्काल फल देने वाला मंत्र है। स्वयंसिद्ध मंत्र होने के कारण इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।अचानक कोई बाधा आ जाए, दुर्घटना का भय हो, कोई समस्या बार-बार प्रकट होकर कष्ट देती हो, कार्यों में बाधाएं आती हों, हिंसक पशुओं का भय हो या कोई अज्ञात भय परेशान करता है तो वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना से उससे तत्काल राहत मिलती है।
1-यदि पशुओं से या हिंसक जीवों से प्राणहानि का भय हो तब मंत्र के सात बार जप से निवारण हो जाता है।
2-यदि मंत्र को एक हज़ार बार बिना रुके लगातार जप लिया जाए तो स्मरण शक्ति में अद्भुत चमत्कार देखा जा सकता है।
3-यदि मंत्र का जप बिना रुके लगातार दस हजार बार कर लिया जाय तो त्रिकालदृष्टि यानी भूत, वर्त्तमान, भविष्य के संकेत पढ़ने की शक्ति आने लगती है।
4-मंत्र का बिना रुके लगातार एक लाख जप रुद्राक्ष की माला से करने पर खेचरत्व और भूचरत्व की प्राप्ति हो जाती है। इसके लिए लाल वस्त्र धारण करके, लाल आसन पर विराजमान होकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
5-इस साधना को हंसी खेल ना समझे;आवश्यकता पड़ने पर ही और स्वयं या किसी अन्य के कल्याण के उद्देश्य से ही मंत्र-जप होना चाहिए। किसी को परेशान करने के उद्देश्य से होने पर उल्टा फल होगा।
1-वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र ;-
यह तत्काल फल देने वाला मंत्र कहा गया है....
''ॐ हं ठ: ठ: ठ: सैं चां ठं ठ: ठ: ठ: ह्र: ह्रौं ह्रौं ह्रैं क्षैं क्षों क्षैं क्षं ह्रौं ह्रौं क्षैं ह्रीं स्मां ध्मां स्त्रीं सर्वेश्वरी हुं फट् स्वाहा।''।
2-वीरभद्र तीव्र मंत्र;-
ये मंत्र बेहद तीब्र और शक्तिशाली माना गया है। सकल बाधा हरने वाले इस मंत्र को 'वीर भाव' से ही अथार्त ऊँची ध्वनि में किया जाता है।
''ॐ ड्रं ह्रौं बं जूं बं हूं बं स: बीर वीरभद्राय प्रस्फुर प्रज्वल आवेशय जाग्रय विध्वंसय क्रुद्धगणाय हुं''।।
3-चतुर्दशाक्षर वीरभद्र मन्त्र ;–
“क्लीं प्रीं वीरभद्र जय जय नमः स्वाहा ।।”
ऋषि भैरव, देवता वीरभद्ररुपी महाकाल भैरव । जगती छन्द, खं बीज, स्वाहा शक्ति तथा फट् कीलक पक्षिराज शरभ के समान ।
4-महाकाल रुद्र मन्त्र ;–
''ॐ ह्रौं वं क्षौं जूं महाकाल रुद्राय ह्रौं ह्रौं हुं''।।Om Hroum Vam Kshoum Joom Mahaakaala Rudaaya Hroum Hroum Hum
5-अघोर रुद्र की साधना;-
पशुपति सदाशिव के दक्षिण वक्त्ररूप अघोर रूद्र का तीन भाव जानने में आता है-- अघोर, घोर और घोरतर ।तीनों भावों के संयुक्त रूप को अघोर रूद्र की संज्ञा प्राप्त है।अघोर रूद्र के निर्मल स्वच्छरूप का ध्यान मोक्ष प्रदाता, रक्तवर्णी अघोर का ध्यान काम सिद्धि हेतु और कृष्ण वर्णी अघोर रूद्र का ध्यान मारण-मोहनादि घोर तांत्रिक अभिचार की सिद्धि-निवृत्ति साथ ही प्रतिकूल ग्रहों की मारक प्रभाव से निवृत्ति में अचूक परिणाम प्रदान करता है।
5-1-अघोर मन्त्र काजप, पूजन, हवन आदि करने वाले साधक को शत्रु, रोग, ग्रहपीडा, शस्त्र भय तथा ज्वरादिक रोग स्पर्श भी नहीं कर सकते ।इस मंत्र को बिना सिद्द किये ही तीन बार बोल कर शरीर को फूँक लेने से सभी प्रकार के तंत्रिक प्रयोग और पारलौकिक शक्तियों से शरीर सुरक्षित रहता है।
अघोर रुद्र मन्त्र ;–
॥ "ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह बम बम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् "॥
(1-स्फुर..कंपन/फड़कना 2-प्रस्फुर निकलना /प्रकाशित होना3-तनु ..कृश
4-चट...जल्दी से /तुरंत 5-प्रचट...अति उग्र,6-बम ..प्रणव का सरल रूप)
विनियोगः-
ॐ अस्य अघोर मन्त्रस्य ऋषिर्घोर:, छंदस्त्रिष्टुप्, देवता अघोर रुद्रः, बीजम् हुं, ह्रीं शक्तयै: विनियोगः ।
ऋष्यादि न्यास :-
अघोरर्षये नमः .. (शिरसि) ।
त्रिस्टुब् छन्दसे नमः .. (मुखे)।
अघोररुद्र देवतायै नमः .. (हृदये),
हुं बीजाय नमः (गुह्ये),
ह्रीं शक्तयै नमः . ( पादयोः)।
षडंग न्यास:-
ह्रीं स्फुर स्फुर हृदयाय नमः,
प्रस्फुर प्रस्फुर शिरसे स्वाहा ,
घोर घोरतर तनुरूप शिखायै वषट्,
चट चट प्रचट प्रचट कवचाय हुं,
कह कह बम बम नेत्रत्रयाय वौषट्,
बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् अस्त्राय फट्