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प्रकृति ने मानव कल्याण के लिए कई औषधीय पेड़-पौधे दिए हैं, जिनमें वरुण वृक्ष एक अत्यंत उपयोगी और दुर्लभ वृक्ष है। आयुर्वे...
09/03/2026

प्रकृति ने मानव कल्याण के लिए कई औषधीय पेड़-पौधे दिए हैं, जिनमें वरुण वृक्ष एक अत्यंत उपयोगी और दुर्लभ वृक्ष है। आयुर्वेद में इसे महत्वपूर्ण औषधि माना जाता है। प्राचीन काल से इसका उपयोग किडनी, मूत्राशय, पाचन तंत्र और त्वचा रोगों के उपचार में किया जाता रहा है। वरुण की छाल, जड़ और पत्तियाँ औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं, जो शरीर को अंदर से शुद्ध करने में सहायक मानी जाती हैं।

♦️ वरुण वृक्ष के प्रमुख औषधीय लाभ —

✅ किडनी व मूत्राशय की पथरी में लाभकारी :-
वरुण को आयुर्वेद में पथरी नाशक औषधि कहा गया है। इसके मूत्रवर्धक गुण पेशाब की मात्रा बढ़ाकर छोटी पथरियों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। यह यूरिन इंफेक्शन, जलन, सूजन और रुकावट जैसी समस्याओं में भी लाभकारी होता है।

✅ अंदरूनी घाव और अल्सर में सहायक :-
वरुण की छाल का काढ़ा शरीर के अंदरूनी घावों को जल्दी भरने में मदद करता है और अल्सर की समस्या में भी लाभकारी माना जाता है।

✅ एसिडिटी और पाचन सुधार :-
वरुण की पत्तियों का काढ़ा पीने से एसिडिटी, गैस और पाचन संबंधी समस्याओं में आराम मिलता है तथा भूख भी बेहतर होती है।

✅ भूख न लगने की समस्या में उपयोगी :-
वरुण पाउडर को शहद के साथ लेने से भूख न लगने की समस्या दूर होती है और शरीर का पोषण बेहतर होता है।

✅ वजन नियंत्रण में सहायक :-
यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को संतुलित कर अनावश्यक चर्बी कम करने में भी सहायक माना जाता है।

✅ त्वचा के लिए लाभकारी :-
वरुण वात दोष को संतुलित करता है, जिससे त्वचा का रूखापन, झुर्रियाँ और समय से पहले बुढ़ापे के लक्षण कम होते हैं। त्वचा अंदर से साफ़ और स्वस्थ बनती है।

♦️ सेवन करने का तरीका —

1) एक चम्मच वरुण की छाल को 2 कप पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए तो छानकर गुनगुना पिएँ। इसका दिन में 1–2 बार सेवन किया जा सकता है।

2) आधा चम्मच वरुण छाल का चूर्ण गुनगुने पानी के साथ भी लिया जा सकता है।

3) त्वचा के लिए छाल का पेस्ट नारियल तेल में मिलाकर बाहरी रूप से लगाया जा सकता है।

♦️ आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णन —
वरुण वृक्ष का वर्णन चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलता है, जो इसके औषधीय महत्व को प्रमाणित करता है।

♦️ विलुप्त होने के कगार पर वरुण वृक्ष —
दुर्भाग्यवश, अंधाधुंध कटाई, जंगलों के नष्ट होने और जागरूकता की कमी के कारण वरुण वृक्ष आज विलुप्त होने के खतरे में है। यदि समय रहते इसका संरक्षण और रोपण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस अमूल्य औषधीय धरोहर से वंचित रह सकती हैं।

🌱 आइए, वरुण वृक्ष को बचाने और अधिक से अधिक लगाने का संकल्प लें। 🙏

।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।।। शौच और दैनिक आचरण के नियम ।।।। धार्मिक ग्रंथों में बताए गए नियम ।।शास्त्रों के अनुसार सुबह की ...
08/03/2026

।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।

।। शौच और दैनिक आचरण के नियम ।।

।। धार्मिक ग्रंथों में बताए गए नियम ।।

शास्त्रों के अनुसार सुबह की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

सनातन धर्म में शारीरिक स्वच्छता और दैनिक आचरण को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।

शास्त्रों में शौच, दन्तधावन (दातुन), स्नान और स्वच्छता से जुड़े अनेक नियम बताए गए हैं।

इन नियमों का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुशासन ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के प्रति सम्मान भी है।

1. मल-मूत्र त्याग से जुड़े नियम

धर्मग्रंथों में बताया गया है कि शौच करते समय कुछ नियमों का पालन करना चाहिए।

मल त्याग करते समय जल्दी-जल्दी सांस नहीं लेनी चाहिए।
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)

किसी भी जलाशय जैसे नदी, तालाब, कुएँ आदि से पर्याप्त दूरी पर ही मूत्र या मल त्याग करना चाहिए।
(धर्मसिंधु)

किसी वृक्ष की छाया में मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए।
(आपस्तम्ब धर्मसूत्र)

शौच करते समय सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र या आकाश की ओर नहीं देखना चाहिए और अपने मल-मूत्र की ओर भी नहीं देखना चाहिए।
(देवीभागवत, कूर्मपुराण)

निम्न स्थानों पर मल-मूत्र त्याग करना निषिद्ध बताया गया है
नदी या जलाशय के पास
गौशाला में
खेत में
हरी घास पर
मंदिर या देवालय के पास
चौराहे पर
श्मशान में
रास्ते या पुल पर
वृक्ष की जड़ के पास
लोगों के घरों के पास
(ब्रह्मवैवर्तपुराण, गरुड़पुराण)

सूर्य, अग्नि, गौ, गुरु, ब्राह्मण, स्त्री, चन्द्रमा, जल और मंदिर की ओर मुख करके शौच या मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए।

महाभारत में बताया गया है कि सूर्य या वायु की दिशा में मूत्र त्याग करना अशुभ माना गया है।

2. कुल्ला और मुख शुद्धि के नियम

शास्त्रों के अनुसार कुल्ला करते समय भी दिशा का ध्यान रखना चाहिए।

सामने देवताओं और दाहिने पितरों का निवास माना गया है।

इसलिए कुल्ला करते समय मुख नीचे करके पानी को बायीं ओर फेंकना चाहिए।
(व्याघ्रपाद स्मृति)

3. दातुन करने के नियम

प्राचीन समय में दांत साफ करने के लिए वृक्षों की दातुन का उपयोग किया जाता था।

।। दातुन के लिए उपयुक्त वृक्ष ।।

इन वृक्षों की दातुन करना शुभ माना गया है

नीम
बेल
खैर
अर्जुन
आम
महुआ
कदम्ब
बेर
करंज
गूलर
कनेर
बबूल
(विश्वामित्र स्मृति)

जिन वृक्षों की दातुन नहीं करनी चाहिए।

पलाश
कपास
कचनार
तेंदू
रीठा
बहेड़ा
सहिजन
सेमल

।। दातुन का आकार ।।

दातुन सीधी होनी चाहिए

लगभग बारह अंगुल लंबी

छोटी उंगली के अग्रभाग जितनी मोटी

(वशिष्ठ स्मृति)

।। दातुन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें ।।

दातुन को पहले पानी से धोना चाहिए

दातुन के बाद उसे फिर से धोकर स्वच्छ स्थान पर फेंकना चाहिए

कोयला, राख, ईंट, पत्थर या नाखून से दांत साफ नहीं करना चाहिए
(स्कन्दपुराण)

।। दातुन के विशेष फल ।।

शास्त्रों में कुछ वृक्षों की दातुन के विशेष लाभ बताए गए हैं।

महुआ की दातुन से पुत्र लाभ

आक की दातुन से नेत्रों को लाभ

बेर की दातुन से वाणी में प्रभाव

बेल और खैर से ऐश्वर्य

कदम्ब से रोगों का नाश

पीपल से यश की प्राप्ति
(स्कन्दपुराण)

4. स्नान से जुड़े नियम

धर्मग्रंथों में स्नान के भी कुछ नियम बताए गए हैं।

नदी में स्नान करते समय धारा की दिशा की ओर मुख करके स्नान करना चाहिए।

(महाभारत)

बिना थकान दूर किए या बिना मुख धोए स्नान नहीं करना चाहिए।
(चरकसंहिता)

धूप से बहुत गर्म शरीर होने पर तुरंत स्नान नहीं करना चाहिए, इससे सिर दर्द और आंखों की समस्या हो सकती है।
(नीतिवाक्यामृत)

पूर्ण रूप से नग्न होकर स्नान नहीं करना चाहिए।
(मनुस्मृति)

पुरुषों को सिर के ऊपर से स्नान करना चाहिए, केवल शरीर धोकर स्नान अधूरा माना गया है।
(वामनपुराण)

5. तेल लगाने से जुड़े नियम

कुछ तिथियों पर शरीर में तेल लगाने से बचने की सलाह दी गई है।

इन तिथियों पर तेल नहीं लगाना चाहिए
प्रतिपदा
षष्ठी
अष्टमी
एकादशी
चतुर्दशी
पूर्णिमा
अमावस्या
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)

सिर पर लगाने के बाद बचा हुआ तेल शरीर पर नहीं लगाना चाहिए।
(कूर्मपुराण)

।। निष्कर्ष ।।

सनातन धर्म में शौच, स्नान और दैनंदिन जीवन से जुड़े ये नियम केवल धार्मिक परंपरा नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के सम्मान से भी जुड़े हुए हैं।

इन नियमों का उद्देश्य मनुष्य को अनुशासित, स्वस्थ और सात्विक जीवन की ओर प्रेरित करना है।









🔸मदिरा-मीमांसा (समापन):🔸क्या आप पीने के 'अधिकारी' हैं? 🥃⚖️​सात भागों की इस शोधपरक यात्रा का आज समापन हो रहा है। हमने मदि...
07/03/2026

🔸मदिरा-मीमांसा (समापन):
🔸क्या आप पीने के 'अधिकारी' हैं? 🥃⚖️

​सात भागों की इस शोधपरक यात्रा का आज समापन हो रहा है। हमने मदिरा के औषधीय गुणों से लेकर उसके विनाशकारी मदात्यय तक के सफर को जिया। अंतिम भाग में जानिये वो 3 सुरक्षा नियम जो किसी भी व्यक्ति के अंगों को गलने से बचा सकते हैं।

​याद रखिये, आयुर्वेद शराब का समर्थन नहीं, बल्कि 'सत्य का विश्लेषण' करता है। यदि आपके पास मर्यादा का पौष्टिक आहार और विवेक का होश नहीं है, तो प्याला उठाना आत्मघाती है। इस शृंखला को साझा करें ताकि समाज न केवल नशे को, बल्कि उसके पीछे छिपे विज्ञान और विनाश को भी समझ सके। 🙏✨

मदिरा-मीमांसा: भाग-7—
(अंतिम मीमांसा)

मदिरा-मीमांसा की इस सात दिवसीय वैचारिक यात्रा का उद्देश्य न तो शराब का प्रचार था और न ही केवल खोखला विरोध। इसका उद्देश्य था—सत्य का अनावरण। इस अंतिम भाग में हम उन व्यावहारिक सुरक्षा निर्देशों की चर्चा करेंगे, जो किसी भी 'मदिरा-सेवी' के लिए जीवन और मृत्यु के बीच की अंतिम दीवार हैं, और साथ ही इस संपूर्ण श्रृंखला का सार प्रस्तुत करेंगे।

🔸​पीने वालों के लिए
🔸सुरक्षा निर्देश

​यदि कोई व्यक्ति सामाजिक या औषधीय कारणों से मदिरा का सेवन करता है, तो आयुर्वेद के ये तीन अटल नियम उसके अंगों को गलने से बचा सकते हैं—

1️⃣​मदिरा शरीर के ओज और जल को सुखाती है। नियम यह है कि आप जितनी मदिरा पीते हैं, उससे कम से कम तीन गुना अधिक सादा जल का सेवन अंतराल में अवश्य करें। यह 'मृदु-विष' की तीव्रता को कम कर लीवर की रक्षा करता है।

2️⃣खाली पेट मदिरा पीना साक्षात् काल को आमंत्रण देना है। पीने से पूर्व या साथ में घी, मक्खन, बादाम या पौष्टिकता से भरपूर जैसे स्निग्ध पदार्थों का सेवन अनिवार्य है। यह पेट की आंतरिक परत पर एक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे अल्कोहल सीधे रक्त में नहीं मिलता।

3️⃣​आयुर्वेद मद्यपान करने वालों को मद्य के प्रथम या द्वितीय चरण से अधिक की नशा करने की इजाजत नहीं देता। जैसे ही वाणी लड़खड़ाने लगे या बुद्धि धुंधली होने लगे, समझ लीजिये कि औषधि 'विष' में बदल चुकी है। उस बिंदु पर रुक जाना ही 'विवेक' है।

​इस मीमांसा का निष्कर्ष यह है कि मदिरा स्वयं में न अच्छी है न बुरी; यह केवल एक 'द्रव्य' है। इसकी प्रकृति का निर्धारण 'कर्ता' (पीने वाला), 'विधि' (तरीका) और 'पात्र' (योग्यता) द्वारा होता है।
​विवेकी और समर्थ व्यक्ति के लिए, जो मर्यादा और पुष्टाहार का पालन करता है, यह अमृतवद् (औषधि) है।
​गरीब और अभावग्रस्त व्यक्ति के लिए, जिसके पास इसे संतुलित करने के लिए पौष्टिक आहार नहीं हैं, यह महाविष है।

​अविवेक और तामसिक व्यक्ति के लिए, जो इसे केवल होश खोने के लिए पीता है, यह कालपाश है।

​आधुनिक युग में जहाँ शराब एक राजस्व का साधन और सामाजिक स्टेटस बन चुकी है, वहाँ आयुर्वेद की यह 'मीमांसा' हमें सचेत करती है कि हम अपनी चेतना को सस्ते नशे के बदले न बेचें। यदि आप अपनी इंद्रियों के स्वामी हैं, तभी आप मदिरा के स्पर्श के अधिकारी हैं। अन्यथा, जल ही वह अमृत है जो बिना किसी दुष्प्रभाव के जीवन देता है।

​"स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं च।"
(स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोगों को दूर करना ही जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए।)
मदिरा-मीमांसा तो समाप्त है, परंतु कुछ पाठकों ने प्रश्न रखे हैं, तो अगला लेख उन प्रश्नों से सम्बन्धित रहेगा, यह भी रोचक ही है, इसे भी पढ़ें

हमारा मानव शरीर एक बहुत ही जटिल मशीन है। जब इसके अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा होता है, तो यह हमें अलग-अलग तरीकों से बताने की...
02/03/2026

हमारा मानव शरीर एक बहुत ही जटिल मशीन है। जब इसके अंदर कुछ ठीक नहीं चल रहा होता है, तो यह हमें अलग-अलग तरीकों से बताने की कोशिश करता है। हम अक्सर इन छोटे-मोटे 'अजीब' लक्षणों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, यह सोचकर कि यह सामान्य है।
​इस विंटेज स्टाइल के पोस्टर में उन 9 आम, लेकिन थोड़े अजीब शारीरिक लक्षणों को दर्शाया गया है, जिन्हें हमें समझना चाहिए:

​🤯 तनाव और मानसिक स्वास्थ्य के संकेत:
​अचानक फड़कना (Twitching): अक्सर थकान, कैफीन की अधिकता या दबे हुए तनाव के कारण मांसपेशियां अचानक फड़कने लगती हैं।

​सुबह 3 बजे जागना: इसे कई बार 'तनाव का घंटा' भी कहा जाता है। अगर आपकी नींद रोज़ इसी समय खुलती है, तो यह चिंता या बढ़े हुए कोर्टिसोल लेवल का संकेत हो सकता है।
​दिल की अनियमित धड़कन: घबराहट या एंग्जायटी का एक बहुत आम लक्षण।

​ पाचन और मेटाबॉलिज्म से जुड़े संकेत:
​खाने के बाद दिमागी धुंध (Brain Fog): अगर खाना खाने के बाद आपको सोचने में दिक्कत होती है या बहुत नींद आती है, तो यह इंसुलिन रेजिस्टेंस या फूड सेंसिटिविटी का इशारा हो सकता है।
​अचानक चीनी की लालसा: यह अक्सर ब्लड शुगर में गिरावट, मैग्नीशियम की कमी या तनाव के कारण होता है।
​पेट की तेज गड़गड़ाहट और लगातार गला साफ करना: यह खराब पाचन, एसिड रिफ्लक्स या गट हेल्थ (पेट के स्वास्थ्य) में गड़बड़ी के संकेत हैं।

​👉 अन्य चेतावनी सिग्नल:
​त्वचा में खुजली (बिना दानों के) और सुइयां चुभना: यह लीवर की समस्या, नसों की कमजोरी या विटामिन B12 जैसी पोषक तत्वों की कमी की तरफ इशारा कर सकता है।

​महत्वपूर्ण सलाह:
ये लक्षण सामान्य लग सकते हैं, लेकिन अगर ये बार-बार हो रहे हैं, तो आपका शरीर मदद मांग रहा है। इंटरनेट पर खुद इलाज खोजने के बजाय, कृपया एक डॉक्टर से सलाह लें और अपने स्वास्थ्य की जांच कराएं।

🚨 क्या आपका शरीर आपको कोई चेतावनी दे रहा है? इन अजीब लक्षणों को न करें इग्नोर! 🩺✨​हमारा शरीर बहुत स्मार्ट है। जब अंदर को...
28/02/2026

🚨 क्या आपका शरीर आपको कोई चेतावनी दे रहा है? इन अजीब लक्षणों को न करें इग्नोर! 🩺✨

​हमारा शरीर बहुत स्मार्ट है। जब अंदर कोई परेशानी या किसी विटामिन/मिनरल की कमी होती है, तो यह हमें बाहरी लक्षणों के ज़रिए बताने की कोशिश करता है। अगर आप भी रोज़मर्रा में ये अजीब लक्षण महसूस करते हैं, तो दवाइयों से पहले इन आसान घरेलू उपायों और सही डाइट से इन्हें ठीक करने की कोशिश करें:

​🥱 1. ज़्यादा उबासी आना (ऑक्सीजन की कमी)
​क्या करें/खाएं: खुली हवा में गहरी सांसें (प्राणायाम) लें। आयरन वाली चीज़ें बढ़ाएं ताकि खून में ऑक्सीजन का फ्लो अच्छा हो।
​कब और कैसे: सुबह उठकर 10-15 मिनट गहरी सांसों की एक्सरसाइज करें। नाश्ते के साथ 1 गिलास चुकंदर और गाजर का ताज़ा जूस पिएं।

​🤢 2. मुंह से बदबू आना (पेट की खराबी/खराब पाचन)
​क्या खाएं (घरेलू उपाय): सौंफ, पुदीना और प्रोबायोटिक्स (दही/छाछ)।
​कब, कैसे और कितना: रोज़ाना दोपहर के खाने के बाद 1 कटोरी ताज़ा दही या जीरा-हींग वाली छाछ पिएं। खाना खाने के तुरंत बाद 1 चम्मच सौंफ चबा-चबा कर खाएं।

​💇‍♀️ 3. बहुत बाल टूटना (आयरन की कमी)
​क्या खाएं: भुना चना, गुड़, पालक और आंवला।
​कब, कैसे और कितना: रोज़ शाम को भूख लगने पर 1 मुट्ठी भुना चना और थोड़ा सा गुड़ खाएं। सुबह खाली पेट 2 चम्मच ताज़ा आंवले का रस पानी में मिलाकर पिएं।

​👂 4. कान में सीटी बजना / Tinnitus (हाई ब्लड प्रेशर का संकेत)
​क्या खाएं/करें: नमक (Sodium) कम करें और पोटैशियम बढ़ाएं।
​कब, कैसे और कितना: रोज़ाना 1 केला नाश्ते में खाएं या दिन में 1 बार ताज़ा नारियल पानी पिएं। पैकेट वाले स्नैक्स बिल्कुल बंद कर दें।

​🖐️ 5. उंगलियों में झनझनाहट (विटामिन B12 की कमी)
​क्या खाएं: दूध, पनीर, अंकुरित अनाज (Sprouts)।
​कब, कैसे और कितना: रोज़ सुबह नाश्ते में 1 कटोरी अंकुरित मूंग/चना हल्का उबाल कर खाएं। रात को सोने से पहले 1 गिलास गुनगुना हल्दी वाला दूध पिएं।

​🦶 6. पैरों में सूजन (किडनी/दिल की तकलीफ या Water Retention)
​क्या खाएं (घरेलू उपाय): धनिये का पानी। यह किडनी को डिटॉक्स करता है।
​कब, कैसे और कितना: रात को 1 गिलास पानी में 1 चम्मच खड़ा धनिया भिगो दें। सुबह इसे हल्का गुनगुना करके छान लें और खाली पेट पिएं। नमक का सेवन कम करें।

​🦵 7. सोते समय नस चढ़ना & 🍩 8. मीठा खाने का बहुत मन करना (मैग्नीशियम की कमी)
​क्या खाएं: कद्दू के बीज (Pumpkin seeds), भीगे हुए बादाम और डार्क चॉकलेट।
​कब, कैसे और कितना: रोज़ाना सुबह खाली पेट 4-5 रात के भीगे हुए बादाम छीलकर खाएं। शाम को 1 चम्मच कद्दू के बीज चबाएं। मीठे की क्रेविंग होने पर 1-2 छोटे टुकड़े डार्क चॉकलेट (70% कोको) के खा लें।

​🤕 9. सिर में दर्द (पानी की कमी/Dehydration)
​क्या खाएं/पिएं: पानी, खीरा, तरबूज।
​कब, कैसे और कितना: पूरे दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी घूंट-घूंट करके पिएं (एक साथ गट-गट न पिएं)। जब भी सिरदर्द शुरू हो, 1 गिलास हल्का गुनगुना पानी पिएं। लंच में 1 प्लेट खीरे का सलाद ज़रूर खाएं।

​🥶 10. हाथ-पैर ठंडे रहना (खून का दौरा/Circulation ठीक न होना)
​क्या खाएं (घरेलू उपाय): लहसुन, अदरक और दालचीनी।
​कब, कैसे और कितना: सुबह खाली पेट 1 कच्ची लहसुन की कली हल्के गुनगुने पानी के साथ निगल लें (चबाएं नहीं)। दिन में एक बार अदरक या दालचीनी की चाय पिएं।

​💡 ज़रूरी सलाह: ये सभी घरेलू उपाय आपकी जीवनशैली को बेहतर बनाने के लिए हैं। यदि आपको इनमें से कोई भी समस्या बहुत ज़्यादा या लंबे समय से है, तो डॉक्टर से चेकअप ज़रूर करवाएं!

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नागरमोथा (मुस्ता) एक अत्यंत गुणकारी औषधीय पौधा है, जिसे लोग अक्सर साधारण खरपतवार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यह खेतों और...
27/02/2026

नागरमोथा (मुस्ता) एक अत्यंत गुणकारी औषधीय पौधा है, जिसे लोग अक्सर साधारण खरपतवार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यह खेतों और बगीचों में अपने-आप उग जाता है, इसलिए कई लोग इसे बेकार मानकर उखाड़ फेंक देते हैं, जबकि इसकी जड़ों में औषधीय गुणों का अनमोल भंडार छिपा होता है। आयुर्वेद में इसका उपयोग हजारों वर्षों से किया जाता रहा है।

नागरमोथा की जड़ें विशेष रूप से पाचन तंत्र को मजबूत करने में सहायक मानी जाती हैं। यह गैस, अपच और दस्त जैसी समस्याओं में लाभकारी होती है तथा पेट को संतुलित रखने में मदद करती है।

🌿 नागरमोथा के अद्भुत औषधीय फायदे जानिए —

1️⃣ पाचन तंत्र के लिए वरदान :-
पाचन के लिए नागरमोथा अत्यंत लाभकारी है। इसमें भूख बढ़ाने और पाचन सुधारने वाले गुण पाए जाते हैं। यह मंदाग्नि यानी कम भूख लगने की समस्या को दूर करता है, दस्त और पेट की मरोड़ में राहत देता है और पेट के हानिकारक कीड़ों को खत्म करने में मदद करता है। पाचन समस्याओं में इसे शहद या गुनगुने पानी के साथ लेना सबसे सरल और असरदार तरीका है।

2️⃣ बुखार कम करने में सहायक :-
इसके अलावा, नागरमोथा बुखार को कम करने में भी प्रभावी माना जाता है। पुराने या बार-बार आने वाले बुखार में इसका काढ़ा शरीर के तापमान को सामान्य करने और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

3️⃣ महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं में मददगार :-
महिलाओं के स्वास्थ्य में भी इसका विशेष महत्व है। मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द को कम करने में यह सहायक है और अनियमित पीरियड्स को संतुलित करने में मदद करता है।

4️⃣ वजन घटाने में सहायक :-
वजन नियंत्रण में भी नागरमोथा उपयोगी है। इसमें एंटी-ओबेसिटी गुण होते हैं जो शरीर में जमा हुए अतिरिक्त फैट को कम करने में मदद करते हैं।

5️⃣ त्वचा और सौंदर्य के लिए लाभकारी :-
त्वचा और सौंदर्य के लिए भी नागरमोथा काफी लाभकारी है। इसकी खुशबू और एंटी-बैक्टीरियल गुण त्वचा को साफ और स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। मुँहासे और दाग-धब्बे कम करने के लिए इसका लेप लगाया जा सकता है, जबकि खुजली और त्वचा संक्रमण होने पर इसके काढ़े से प्रभावित हिस्से को धोना लाभकारी होता है।

🌿 नागरमोथा का कौन सा भाग इस्तेमाल किया जाता हैं?

नागरमोथा में औषधीय गुण मुख्य रूप से इसकी जड़ और उससे बनने वाले छोटे गांठ वाले ट्यूबर (tubers) में पाए जाते हैं। इसे आयुर्वेद में सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।

■ जड़ और ट्यूबर :- सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला भाग है। इन्हें सुखाकर या ताजा रूप में चूर्ण, काढ़ा, तेल या लेप बनाने में उपयोग किया जाता है।

■ पत्तियां और तना :- इनका औषधीय उपयोग कम होता है और मुख्यतः जड़ की तुलना में विशेष असर नहीं होता है।

🌿 नागरमोथा का उपयोग कैसे करें —

1) नागरमोथा चूर्ण :-
नागरमोथा की सूखी जड़ों को पीसकर बनाया गया चूर्ण 1–3 ग्राम की मात्रा में शहद या गुनगुने पानी के साथ दिन में एक या दो बार लिया जा सकता है। यह गैस, अपच, पेट दर्द, दस्त और भूख न लगने जैसी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है तथा पाचन शक्ति को मजबूत करने में सहायक होता है।

2) नागरमोथा का काढ़ा :-
काढ़ा बनाने के लिए लगभग एक छोटा चम्मच (लगभग 5 ग्राम) नागरमोथा चूर्ण को एक कप पानी में डालकर धीमी आंच पर उबालें। जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर 10–20 मिली० की मात्रा में दिन में दो बार सेवन किया जा सकता है। यह बुखार, पाचन संबंधी विकारों और आंतों की कमजोरी में उपयोगी माना जाता है।

3) नागरमोथा का लेप :-
त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए नागरमोथा का लेप भी उपयोग किया जाता है। इसके चूर्ण में पानी या गुलाब जल मिलाकर गाढ़ा पेस्ट तैयार करें और प्रभावित स्थान पर 20–30 मिनट तक लगाकर रखें, फिर साफ पानी से धो लें। यह खुजली, फंगल संक्रमण, हल्की सूजन और त्वचा की जलन में सहायक माना जाता है।

⚠️ सावधानियाँ —
किसी भी जड़ी-बूटी का नियमित सेवन करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है, खासकर यदि आप गर्भवती हैं या किसी विशेष दवा का सेवन कर रहे हैं।

#नागरमोथा

"ऊन का आसन : ऊर्जा का इन्सुलेटर"----------ध्यान या साधना में ऊन का आसन (जैसे ऊनी कंबल, घोंघड़ी या आसन) पारंपरिक रूप से ब...
13/02/2026

"ऊन का आसन : ऊर्जा का इन्सुलेटर"
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ध्यान या साधना में ऊन का आसन (जैसे ऊनी कंबल, घोंघड़ी या आसन) पारंपरिक रूप से बहुत उपयोग किया जाता है। इसका मुख्य कारण ऊर्जा संबंधी (प्राणिक या सूक्ष्म ऊर्जा) और शास्त्रीय है।

ऊन के आसन का उपयोग क्यों किया जाता है:-

ऊर्जा का इन्सुलेटर :-
जब ध्यान, मंत्र जाप या साधना करते हैं, तो शरीर में विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा (electromagnetic energy) या प्राणिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। ऊन इस ऊर्जा को बाहर की पृथ्वी की धारा में जाने से रोकता है और साधक के शरीर में ही संरक्षित रखता है। इसे "ऊर्जा का कुचालक" माना जाता है, जिससे साधना की शक्ति व्यर्थ नहीं जाती।

शरीर की गर्मी बनाए रखना:-
ऊन प्राकृतिक रूप से गर्मी रोकता है, जिससे लंबे समय तक बैठने में शरीर ठंडा नहीं होता। खासकर सर्दियों में यह बहुत उपयोगी है।

पारंपरिक महत्व:-
भगवद्गीता (अध्याय 6) में आसन की व्यवस्था बताई गई है — कुश + मृगछाला + वस्त्र। समय के साथ कुश के अभाव में ऊन (पशु-लोम) को सबसे अच्छा विकल्प माना गया। कई योग परंपराओं (जैसे क्रिया योग, हिमालयन योग) में भी ऊन को पृथ्वी की नकारात्मक धाराओं से बचाने वाला माना जाता है।

सात्विक और शुद्ध:-
हाथ से बनी प्राकृतिक ऊन की घोंघड़ी को सात्विक माना जाता है, जो मन को शांत और एकाग्र रखने में मदद करती है।

ऊन के अलावा कौन-से आसन उपयोग किए जा सकते हैं:-

शास्त्रों और परंपरा के अनुसार अन्य अच्छे विकल्प ये हैं:-

कुश का आसन (कुश घास का) — सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
यह सात्विक, नकारात्मक ऊर्जा दूर करने वाला और मंत्र सिद्धि के लिए आदर्श है। आजकल कुश आसन बाजार में मिल जाते हैं।
मृगचर्म (हिरण की खाल) — प्राचीन काल में बहुत उपयोग होता था।
यह भी ऊर्जा को संरक्षित रखता है, लेकिन आज नैतिक/कानूनी कारणों से कम इस्तेमाल होता है।
रेशमी आसन (सिल्क क्लॉथ) — कुछ परंपराओं में (जैसे परमहंस योगानंद जी की शिक्षाओं में) रेशम को भी कुचालक माना जाता है।

यह ऊर्जा रोकने में अच्छा काम करता है।
सूती कपड़ा (कॉटन) — साधारण उपयोग के लिए ठीक है, लेकिन ऊन जितना प्रभावी नहीं माना जाता।

कई लोग सूती चादर या कंबल ऊपर बिछाते हैं।

आधुनिक विकल्प :-
** मोटा ऊनी/कॉटन का कंबल।
** योग मैट (प्राकृतिक रबर या जूट का) + ऊपर ऊनी चादर।
** मेडिटेशन कुशन या ज़ाफू (अगर फर्श पर नहीं बैठ पाते)।

सबसे सरल नियम :-
आसन ऐसा हो जो प्राकृतिक हो, कुचालक हो, और लंबे समय तक बैठने में आरामदायक हो। अगर ऊन उपलब्ध न हो तो कुश सबसे अच्छा विकल्प है, अन्यथा मोटा ऊनी/सूती कंबल पर्याप्त है।

ध्यान के लिए सबसे महत्वपूर्ण है स्थिरता, एकाग्रता और नियमितता — आसन सहायक है, लेकिन सच्ची साधना मन की शुद्धता से होती है।

दुनिया के सबसे स्वादिष्ट आम का स्वाद लेना चाहते हैं, तो मियाज़ाकी आम लगाइए। इसे “ढाई लाख रुपये वाला आम” भी कहा जाता है, ...
11/02/2026

दुनिया के सबसे स्वादिष्ट आम का स्वाद लेना चाहते हैं, तो मियाज़ाकी आम लगाइए। इसे “ढाई लाख रुपये वाला आम” भी कहा जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बेहद ऊँची होती है।

अगर आप अपने बगीचे में कुछ अलग और खास लगाना चाहते हैं, तो मियाज़ाकी आम का पौधा एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। सही देखभाल और अनुकूल मौसम में यह हर सीजन आपके बगीचे को खुशबू और स्वाद से भर सकता है। ध्यान रखें कि अच्छी पैदावार के लिए धूप वाली जगह, जलनिकासी वाली मिट्टी और नियमित देखभाल जरूरी है।

🌹शिव तांडव स्तोत्र का महत्व🌹;-1-भगवान शिव की आराधना व उपासना के लिए रचे गए सभी अन्‍य स्‍तोत्रों में रावण रचित या रावण द्...
09/02/2026

🌹शिव तांडव स्तोत्र का महत्व🌹;-

1-भगवान शिव की आराधना व उपासना के लिए रचे गए सभी अन्‍य स्‍तोत्रों में रावण रचित या रावण द्वारा गया गया शिवतांडव स्तोत्र भगवान शिव को अत्‍यधिक प्रिय है, ऐसी हिन्दू धर्म की मान्‍यता है और माना जाता है कि शिवतांडव स्तोत्र द्वारा भगवान शिव की स्तुति करने से व्यक्ति को कभी भी धन-सम्पति की कमी नहीं होती, साथ ही व्‍यक्ति को उत्कृष्ट व्यक्तित्व की प्राप्ति होती है।यानी व्‍यक्ति का चेहरा तेजस्‍वी बनता है तथा उसके आत्‍मविश्‍वास में भी वृद्धि होती है।

2-इस शिवतांडव स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से व्‍यक्ति को जिस किसी भी सिद्धि की महत्वकांक्षा होती है, भगवान शिव की कृपा से वह आसानी से पूर्ण हो जाती है। साथ ही ऐसा भी माना जाता है कि इस स्तोत्र के नियमित पाठ से वाणी सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। यानी व्‍यक्ति जो भी कहता है, वह वैसा ही घटित होने लगता है। नृत्य, चित्रकला, लेखन, योग, ध्यान, समाधी आदि सिद्धियां भगवान शिव से ही सम्‍बंधित हैं, इसलिए शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करने वाले को इन विषयों से सम्‍बंधित सफलता सहज ही प्राप्‍त होने लगती हैं।

3-इतना ही नहीं, शनि को काल माना जाता है जबकि शिव महाकाल हैं, अत: शनि से पीड़ित व्‍यक्ति को इसके पाठ से बहुत लाभ प्राप्‍त है। साथ ही जिन लोगों की जन्‍म-कुण्‍डली में सर्प योग, कालसर्प योग या पितृ दोष होता है, उन लोगों के लिए भी शिवतांडव स्तोत्र का पाठ करना काफी उपयोगी होता है क्‍योंकि हिन्दू धर्म में भगवान शिव को ही आयु, मृत्‍यु और सर्प का स्‍वामी माना गया है।जब कभी स्वास्थ्य की समस्याओं का कोई तत्काल समाधान न निकल पा रहा तो ऐसे में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभदायक होता है। व्यक्ति को जब कभी भी ऐसा लगे कि किसी प्रकार की तंत्र, मंत्र और शत्रु परेशान कर रहा है तो ऐसे में शिव तांडव का पाठ करना अत्यंत लाभदायक होता है।

शिव तांडव स्तोत्र के लाभ;-

1-जब कभी स्वास्थ्य की समस्याओं का कोई तत्काल समाधान न निकल पा रहा तो ऐसे में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करना बेहद लाभदायक होता है। व्यक्ति को जब कभी भी ऐसा लगे कि किसी प्रकार की तंत्र, मंत्र और शत्रु परेशान कर रहा है तो ऐसे में शिव तांडव का पाठ करना अत्यंत लाभदायक होता है।

2-शिव तांडव स्तोत्र का लाभ रावन ने भगवान शिव को प्रसन्न करके लिया था। शिव तांडव स्तोत्र भोलेनाथ के परम भक्त विद्वान् रावण द्वारा रचित एक स्तोत्र है। यह स्तुति पंचचामर छंद में है। मान्यता है कि रावण जब कैलाश लेकर चलने लगे तो शिव जी ने अंगूठे से कैलाश को दबा दिया। परिणामस्वरूप कैलाश वहीं रह गया और रावण दब गया। फिर रावण ने शिव की स्तुति की तब जाकर शिव प्रसन्न हुए। रावण द्वारा की गई यह स्तुति ही शिव तांडव के रूप में जाना जाता है।

3-शास्त्रों के अनुसार, सभी शिव की पूजा कर सकते हैं। कोई नियम नहीं है, किसी भी जाति या लिंग का कोई भी व्यक्ति कभी भी शिव तांडव स्तोत्रम का जाप कर सकता है। सिद्धि प्राप्ति के लिए शिव तांडव स्त्रोत एकमात्र योग्यता भक्ति है। शिव तांडव स्तोत्रम का पाठ आपको शक्ति, मानसिक शक्ति, सुख, समृद्धि और बहुत कुछ देता है। इन सभी से अधिक, आपको निश्चित रूप से शिव का आशीर्वाद प्राप्त होगा।

4-यदि आप पूरी निष्ठा के साथ गीत को सुनते हैं, तो आप निश्चित रूप से शंभू की उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं। शिव तांडव स्त्रोत सबसे ऊर्जावान और शक्तिशाली रचना है जिसे पूरी श्रृष्टि नमन करती है। शिव तांडव स्त्रोत का नियमित पाठ करने से स्वस्थ्य संबंधित रोग दूर होते हैं। शिव तांडव स्त्रोत का पाठ यदि रात्रि में किया जाए तो शत्रु पर प्राप्त होती है, लेकिन ध्यान रहे पाठ करने से पहले मन में किसी के प्रति बुरा विचार ना लाएं। शिव तांडव स्त्रोत को सुबह भजन के रूप में पाठ करने से आपको अपने पापों से मुक्ति मिलती है। शिव से अपनी गलतियों की क्षमा मांगते समय मन को कोमल रखें।

शिव तांडव स्तोत्रं ;-

शिव की स्तुति के लिए रचा गया वह सामवेद का वह स्त्रोत, जिसे रावण ने गाया था, को आज भी रावण-स्त्रोत व शिव तांडव स्‍त्रोत के नाम से जाना जाता है, जो कि निम्‍नानुसार है-
जटा-टवी–गलज्ज -जल–प्रवाह–पावित–स्थले

गलेऽव–लम्ब्य–लम्बितां–भुजङ्ग–तुङ्ग–मालिकाम्

डमड्ड-डमड्ड-डमड्ड-डमड्ड–निनाद-वड्ड-डमर्वयं

चकार–चण्ड्-ताण्डवं–तनोतु–नः शिवः शिवम् .. 1..

जटा–कटाह-संभ्रम-भ्रमन्नि–निलिम्प–निर्झरी-

विलोल-वीचि-वल्लरी–विराजमान–मूर्धनि .

धगद्ध-धगद्ध-धगद्ध–ज्ज्वलल–ल्ललाट–पट्ट–पावके

किशोर-चन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. 2..

धरा–धरेन्द्र–नंदिनी-विलास–बन्धु–बन्धुर

स्फुरद–दिगन्त–सन्तति-प्रमोद–मान–मानसे .

कृपा–कटाक्ष–धोरणी–निरुद्ध–दुर्धरा-पदि

कव्चिद–द्दिगम्बरे–मनो विनोद-मेतु वस्तुनि .. 3..

जटा–भुजङ्ग–पिङ्गल–स्फुरत- फणा–मणिप्रभा

कदम्ब–कुङ्कुम–द्रव-प्रलिप्त–दिग्वधू-मुखे

मदान्ध–सिन्धुर–स्फुरत्त्व–गुत्तरी–यमे–दुरे

मनो विनोद-मद्भुतं–बिभर्तु–भूतभर्तरि .. 4..

सहस्र-लोचन-प्रभृत्य–शेष–लेख–शेखर

प्रसून–धूलि–धोरणी–विधू–सराङ्घ्रि–पीठभूः

भुजङ्ग-राज–मालया–निबद्ध–जाटजूटक:

श्रियै–चिराय–जायतां चकोर–बन्धु–शेखरः .. 5..

ललाट–चत्वर–ज्वलद्ध-धनञ्जय–स्फुलिङ्गभा-

निपीत–पञ्च–सायकं–नमन्नि–लिम्प–नायकम्

सुधा–मयूख–लेखया–विराजमान–शेखरं

महाकपालि–सम्पदे–शिरो–जटाल–मस्तुनः.. 6..

कराल–भाल–पट्टिका–धगद्ध-धगद्ध-धगज–ज्ज्वलद्ध

धनञ्जया-हुती-कृत–प्रचण्ड-पञ्च–सायके

धरा–धरेन्द्र–नन्दिनी–कुचाग्र-चित्र–पत्रक

–प्रकल्प–नैक-शिल्पिनि–त्रिलोचने–रतिर्मम … 7..

नवीन–मेघ–मण्डली–निरुद्ध–दुर्धर–स्फुरत्

कुहू–निशीथिनी–तमः प्रबन्ध–बद्ध–कन्धरः

निलिम्प–निर्झरी–धरस्–तनोतु कृत्ति–सिन्धुरः

कला–निधान–बन्धुरः श्रियं जगद्ध-धुरंधरः .. 8..

प्रफुल्ल–नीलपङ्कज–प्रपञ्च–कालिमप्रभा-

–वलम्बि–कण्ठ–कन्दली–रुचिप्रबद्ध–कन्धरम् .

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छि-दांध-कछिदं तमंत-कच्छिदं भजे .. 9..

अखर्व-सर्व–मङ्गला-कला–कदंबमञ्जरी

रस–प्रवाह–माधुरी विजृंभणा–मधुव्रतम् .

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्त–कान्ध–कान्तकं तमन्त-कान्तकं भजे .. 10..

जयत्व–वदभ्र–विभ्रम–भ्रमद्भ--भुजङ्ग–मश्वस-

द्विनिर्गमत-क्रम –स्फुरत- कराल–भाल–हव्य-वाट्

धिमिद्धि-धिमिद्धि-धिमिद्धि-ध्वनम-मृदङ्ग–तुङ्ग–मङ्गल

ध्वनि–क्रम–प्रवर्तित प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः .. 11..

दृषद्वि-चित्र–तल्पयो-र्भुजङ्ग–मौक्ति–कस्रजोर्

गरिष्ठ-रत्न-लोष्ठयोः सुहृद्वि–विपक्ष-पक्षयोः .

तृष्णार–विन्द–चक्षुषोः प्रजा–मही–महेन्द्रयोः

सम-प्रवृति-कः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् .. 12..

कदा निलिम्प–निर्झरी-निकुञ्ज–कोटरे वसन्

विमुक्त–दुर्मतिः सदा शिरःस्थ–मञ्जलिं वहन् .

विलोल–लोल–लोचनो ललाम–भाल-लग्नकः

शिवेति मंत्र–मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. 13..

निलिम्प नाथ-नागरी कदम्ब मौल-मल्लिका-

निगुम्फ-निर्भक्ष-रन्म धूष्णिका-मनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीं-महनिशं

परिश्रय परं पदं तदंग-जत्विषां चयः ॥ 14॥

प्रचण्ड वाडवा-नल प्रभा-शुभ-प्रचारणी

महाअष्ट-सिद्धि-कामिनी जना-अवहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाह-कालिक-ध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्ज-जगयाय जायताम्‌ ॥ 15॥

इमं हि नित्यमेव मुक्त-मुक्त-मोत्तमं स्तवं

पठन-स्मरन- ब्रुवन्नरो- विशुद्धि–मेति–संततम् .

हरे गुरौ सुभक्ति-माशु-याति-नान्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. 16..

पूजा-वसान-समये दश-वक्त्र-गीतं

यः शंभु-पूजन-परं -पठति -प्रदोषे .

तस्य स्थिरां रथ गजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां

लक्ष्मीं सदैव-सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. 17..

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

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शिव तांडव स्तोत्रं का अर्थ

1-सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित (धोती) करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएँ लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें। >>>1

2-अति अम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं तथा जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ धधक कर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल चंद्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिवजी में मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे। >>>2

3-पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम आनंदित चित्त वाले (माहेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, ऐसे (दिशा ही हैं वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा।>>>3

4-जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान पीले प्रभा-समूह रूप केसर कांति से दिशा बंधुओं के मुखमंडल को चमकाने वाले, मतवाले, गजासुर के चर्मरूप उपरने से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा मन विनोद को प्राप्त हो।>>>4

5-इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें।>>>5

6-इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें।>>>6

7-जिनके तीन नेत्र हैं,उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्…की घ्वनि से जलती है,जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला से प्रचंड कामदेव को भस्म करने वाले तथा एकमात्र कलाकार जो पर्वत राजसुता के स्तन के अग्रभाग पर विविध भांति की चित्रकारी करने में अति चतुर त्रिलोचन हैं,में मेरी प्रीति अटल हो।>>>7
8-नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण अमावस्याओं की रात्रि के घने अंधकार की तरह अति गूढ़ कंठ वाले, देव नदी गंगा को धारण करने वाले, जगचर्म से सुशोभित, बालचंद्र की कलाओं के बोझ से विनम्र , जगत के बोझ को धारण करने वाले शिवजी हमको सब प्रकार की सम्पत्ति दें। >>>8

9-फूले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्याम प्रभा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कंधे वाले, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों के काटने वाले, दक्षयज्ञ विध्वंसक, गजासुरहंता, अंधकारसुर नाशक और मृत्यु के नष्ट करने वाले श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ। >>>9

10-कल्याणमय, नाश न होने वाली समस्त कलाओं की कलियों से बहते हुए रस की मधुरता का आस्वादन करने में भ्रमररूप, कामदेव को भस्म करने वाले, त्रिपुरासुर, विनाशक, संसार दुःखहारी, दक्षयज्ञ विध्वंसक, गजासुर तथा अंधकासुर को मारनेवाले और यमराज के भी यमराज श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ।>>>10
11-अत्यंत शीघ्र वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से क्रमशः ललाट में बढ़ी हुई प्रचंड अग्नि वाले मृदंग की धिम-धिम मंगलकारी उधा ध्वनि के क्रमारोह से चंड तांडव नृत्य में लीन होने वाले शिवजी सब भाँति से सुशोभित हो रहे हैं। >>>11

12-कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शय्या में सर्प और मोतियों की मालाओं में मिट्टी के टुकड़ों और बहुमूल्य रत्नों में, शत्रु और मित्र में, तिनके और कमल लोचननियों में, प्रजा और महाराजाधिक राजाओं के समान दृष्टि रखते हुए कब मैं शिवजी का भजन करूँगा। >>>12

13-कब मैं श्री गंगाजी के कछारकुंज में निवास करता हुआ, निष्कपटी होकर सिर पर अंजलि धारण किए हुए चंचल नेत्रों वाली ललनाओं में परम सुंदरी पार्वतीजी के मस्तक में अंकित शिव मंत्र उच्चारण करते हुए परम सुख को प्राप्त करूँगा।>>>13
14-देवांगनाओं के सिर में गूँथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें।>>>14

15-प्रचंड बड़वानल की भाँति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगल ध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएँ।>>>15
16-इस परम उत्तम शिवतांडव श्लोक को नित्य प्रति मुक्तकंठ से पढ़ने से या श्रवण करने से संतति वगैरह से पूर्ण हरि और गुरु में भक्ति बनी रहती है। जिसकी दूसरी गति नहीं होती शिव की ही शरण में रहता है।>>>16
17-शिव पूजा के अंत में इस रावणकृत शिव तांडव स्तोत्र का प्रदोष समय में गान करने से या पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।रथ गज-घोड़े से सर्वदा युक्त रहता है।>>>17

श्री रावणकृतम् शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

तत्काल फल देने वाले 5 मंत्र ;-

भगवन वीरभद्र साधना;-
''My salutations to those who are not terrible, to those who are terrible, and to those who are both terrible and not terrible.
Everywhere and always I bow to all Rudra forms.''
1-वीरभद्र, भगवान शिव के परम आज्ञाकारी हैं। उनका रूप भयंकर है, देखने में वे प्रलयाग्नि के समान, हजार भुजाओं से युक्त और मेघ के समान श्यामवर्ण हैं। सूर्य के तीन जलते हुए बड़े-बड़े नेत्र एवं विकराल दाढ़ें हैं। शिव ने उन्हें अपनी जटा से प्रकट किया था। इसलिए उनकी जटाएं साक्षात ज्वालामुखी के लावा के समान हैं। गले में नरमुंड माला वाले वीरभद्र सभी अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं। उनका रूप भले ही भयंकर है पर शिवस्वरूप होने के कारण वे परम कल्याणकारी हैं ,शीघ्र प्रसन्न होने वाले है।
2-वीरभद्र उपासना तंत्र में वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र आता है। यह एक स्वयं सिद्ध चमत्कारिक तथा तत्काल फल देने वाला मंत्र है। स्वयंसिद्ध मंत्र होने के कारण इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।अचानक कोई बाधा आ जाए, दुर्घटना का भय हो, कोई समस्या बार-बार प्रकट होकर कष्ट देती हो, कार्यों में बाधाएं आती हों, हिंसक पशुओं का भय हो या कोई अज्ञात भय परेशान करता है तो वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना से उससे तत्काल राहत मिलती है।

1-यदि पशुओं से या हिंसक जीवों से प्राणहानि का भय हो तब मंत्र के सात बार जप से निवारण हो जाता है।
2-यदि मंत्र को एक हज़ार बार बिना रुके लगातार जप लिया जाए तो स्मरण शक्ति में अद्भुत चमत्कार देखा जा सकता है।
3-यदि मंत्र का जप बिना रुके लगातार दस हजार बार कर लिया जाय तो त्रिकालदृष्टि यानी भूत, वर्त्तमान, भविष्य के संकेत पढ़ने की शक्ति आने लगती है।
4-मंत्र का बिना रुके लगातार एक लाख जप रुद्राक्ष की माला से करने पर खेचरत्व और भूचरत्व की प्राप्ति हो जाती है। इसके लिए लाल वस्त्र धारण करके, लाल आसन पर विराजमान होकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए।
5-इस साधना को हंसी खेल ना समझे;आवश्यकता पड़ने पर ही और स्वयं या किसी अन्य के कल्याण के उद्देश्य से ही मंत्र-जप होना चाहिए। किसी को परेशान करने के उद्देश्य से होने पर उल्टा फल होगा।
1-वीरभद्र सर्वेश्वरी साधना मंत्र ;-
यह तत्काल फल देने वाला मंत्र कहा गया है....
''ॐ हं ठ: ठ: ठ: सैं चां ठं ठ: ठ: ठ: ह्र: ह्रौं ह्रौं ह्रैं क्षैं क्षों क्षैं क्षं ह्रौं ह्रौं क्षैं ह्रीं स्मां ध्मां स्त्रीं सर्वेश्वरी हुं फट् स्वाहा।''।
2-वीरभद्र तीव्र मंत्र;-
ये मंत्र बेहद तीब्र और शक्तिशाली माना गया है। सकल बाधा हरने वाले इस मंत्र को 'वीर भाव' से ही अथार्त ऊँची ध्वनि में किया जाता है।
''ॐ ड्रं ह्रौं बं जूं बं हूं बं स: बीर वीरभद्राय प्रस्फुर प्रज्वल आवेशय जाग्रय विध्वंसय क्रुद्धगणाय हुं''।।
3-चतुर्दशाक्षर वीरभद्र मन्त्र ;–
“क्लीं प्रीं वीरभद्र जय जय नमः स्वाहा ।।”
ऋषि भैरव, देवता वीरभद्ररुपी महाकाल भैरव । जगती छन्द, खं बीज, स्वाहा शक्ति तथा फट् कीलक पक्षिराज शरभ के समान ।
4-महाकाल रुद्र मन्त्र ;–
''ॐ ह्रौं वं क्षौं जूं महाकाल रुद्राय ह्रौं ह्रौं हुं''।।Om Hroum Vam Kshoum Joom Mahaakaala Rudaaya Hroum Hroum Hum
5-अघोर रुद्र की साधना;-
पशुपति सदाशिव के दक्षिण वक्त्ररूप अघोर रूद्र का तीन भाव जानने में आता है-- अघोर, घोर और घोरतर ।तीनों भावों के संयुक्त रूप को अघोर रूद्र की संज्ञा प्राप्त है।अघोर रूद्र के निर्मल स्वच्छरूप का ध्यान मोक्ष प्रदाता, रक्तवर्णी अघोर का ध्यान काम सिद्धि हेतु और कृष्ण वर्णी अघोर रूद्र का ध्यान मारण-मोहनादि घोर तांत्रिक अभिचार की सिद्धि-निवृत्ति साथ ही प्रतिकूल ग्रहों की मारक प्रभाव से निवृत्ति में अचूक परिणाम प्रदान करता है।
5-1-अघोर मन्त्र काजप, पूजन, हवन आदि करने वाले साधक को शत्रु, रोग, ग्रहपीडा, शस्त्र भय तथा ज्वरादिक रोग स्पर्श भी नहीं कर सकते ।इस मंत्र को बिना सिद्द किये ही तीन बार बोल कर शरीर को फूँक लेने से सभी प्रकार के तंत्रिक प्रयोग और पारलौकिक शक्तियों से शरीर सुरक्षित रहता है।
अघोर रुद्र मन्त्र ;–
॥ "ॐ ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोरतर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह बम बम बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् "॥
(1-स्फुर..कंपन/फड़कना 2-प्रस्फुर निकलना /प्रकाशित होना3-तनु ..कृश
4-चट...जल्दी से /तुरंत 5-प्रचट...अति उग्र,6-बम ..प्रणव का सरल रूप)
विनियोगः-
ॐ अस्य अघोर मन्त्रस्य ऋषिर्घोर:, छंदस्त्रिष्टुप्, देवता अघोर रुद्रः, बीजम् हुं, ह्रीं शक्तयै: विनियोगः ।
ऋष्यादि न्यास :-
अघोरर्षये नमः .. (शिरसि) ।
त्रिस्टुब् छन्दसे नमः .. (मुखे)।
अघोररुद्र देवतायै नमः .. (हृदये),
हुं बीजाय नमः (गुह्ये),
ह्रीं शक्तयै नमः . ( पादयोः)।
षडंग न्यास:-
ह्रीं स्फुर स्फुर हृदयाय नमः,
प्रस्फुर प्रस्फुर शिरसे स्वाहा ,
घोर घोरतर तनुरूप शिखायै वषट्,
चट चट प्रचट प्रचट कवचाय हुं,
कह कह बम बम नेत्रत्रयाय वौषट्,
बन्ध बन्ध घातय घातय हुं फट् अस्त्राय फट्

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